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रिपोर्ट: लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट:सोशल मीडिया में प्रसिद्धि पाने को आपसी विवादों में उलझना ग़ैरज़रूरी—शशांक पाण्डेय

Laxman Singh Bisht

Sun, Mar 15, 2026

सोशल मीडिया में प्रसिद्धि पाने को आपसी विवादों में उलझना ग़ैरज़रूरी—शशांक पाण्डेय

पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया ने समाज के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट की उपलब्धता ने आम लोगों को भी अपनी बात और प्रतिभा दुनिया तक पहुँचाने का अवसर दिया है। आजकल फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर छोटी-छोटी वीडियो या “रील” बनाने का चलन तेजी से बढ़ा है। खासकर युवाओं में यह एक नई पहचान और लोकप्रियता पाने का माध्यम बन गया है। उत्तराखण्ड में भी बड़ी संख्या में युवा रील क्रिएशन की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यही कारण है कि इन दिनों राज्य में रील क्रिएटर काफी चर्चा में हैं।

सबसे पहले यदि इसके सकारात्मक पहलुओं की बात करें तो रील क्रिएटर उत्तराखण्ड की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत को दुनिया तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। पहाड़ों की मनमोहक वादियाँ, नदियाँ, झरने और बर्फ से ढकी चोटियाँ पहले केवल पर्यटकों के अनुभव तक सीमित रहती थीं, लेकिन अब सोशल मीडिया के माध्यम से ये दृश्य लाखों लोगों तक पहुँच रहे हैं। कई युवा अपने वीडियो में राज्य के पर्यटन स्थलों, धार्मिक धामों और पारंपरिक जीवन शैली को दिखाते हैं, जिससे लोगों के बीच उत्तराखण्ड के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है।

उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति भी इन रीलों के माध्यम से नई पहचान प्राप्त कर रही है। कुमाऊँ और गढ़वाल के पारंपरिक लोकगीत, लोकनृत्य, त्यौहार और पहनावा आज सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। कई युवा पारंपरिक वेशभूषा पहनकर लोकगीतों पर रील बनाते हैं, जिससे नई पीढ़ी भी अपनी संस्कृति से जुड़ने लगी है। इस प्रकार रील क्रिएटर एक तरह से सांस्कृतिक दूत की भूमिका निभा रहे हैं।

इसके अलावा सोशल मीडिया ने युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। यदि किसी क्रिएटर की वीडियो अधिक लोकप्रिय हो जाती है तो उसे विज्ञापन, ब्रांड प्रमोशन और अन्य ऑनलाइन गतिविधियों के माध्यम से आय प्राप्त हो सकती है। आज कई ऐसे युवा हैं जो सोशल मीडिया को अपने करियर के रूप में अपनाने लगे हैं। इससे यह भी साबित होता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि रोजगार का एक नया क्षेत्र भी बन चुका है।

हालांकि इसके साथ कुछ समस्याएँ और विवाद भी सामने आ रहे हैं, जिसके कारण रील क्रिएटर चर्चा का विषय बने हुए हैं। कई बार देखा गया है कि कुछ लोग केवल अधिक व्यूज़ और लाइक्स पाने के लिए ऐसे स्थानों पर वीडियो बनाते हैं जहाँ इससे दूसरों को परेशानी होती है। सड़कों के बीच, भीड़भाड़ वाले बाजारों में या ट्रैफिक के बीच रील बनाने से दुर्घटनाओं की संभावना भी बढ़ जाती है। ऐसे मामलों में कई बार पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ता है।

उत्तराखण्ड एक धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से संवेदनशील राज्य है। यहाँ कई प्रसिद्ध मंदिर और तीर्थस्थल स्थित हैं। कुछ मामलों में इन स्थानों पर रील बनाने को लेकर विवाद भी सामने आए हैं। कई लोगों का मानना है कि धार्मिक स्थलों की गरिमा बनाए रखना आवश्यक है और वहाँ मनोरंजन के उद्देश्य से वीडियो बनाना उचित नहीं है। इसलिए कई बार स्थानीय लोगों और प्रशासन ने ऐसे मामलों में रोक लगाने की बात कही है।

इसके अलावा सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने की होड़ में कुछ क्रिएटर आपसी विवादों में भी उलझ जाते हैं। जब ऐसे विवाद सार्वजनिक हो जाते हैं और उनके वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो जाते हैं तो पूरा मामला चर्चा का विषय बन जाता है। इससे न केवल सोशल मीडिया की नकारात्मक छवि बनती है बल्कि समाज में भी गलत संदेश जाता है।इन परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन भी अब अधिक सतर्क हो गया है। कई स्थानों पर पुलिस ने लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर जिम्मेदारी के साथ वीडियो बनाने की सलाह दी है। यदि कोई व्यक्ति ट्रैफिक व्यवस्था को बाधित करता है या सार्वजनिक शांति भंग करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है। प्रशासन का कहना है कि सोशल मीडिया का उपयोग सकारात्मक और जिम्मेदार तरीके से किया जाना चाहिए।

समाज के स्तर पर भी यह जरूरी है कि लोग सोशल मीडिया के अच्छे उपयोग को बढ़ावा दें। यदि रील क्रिएटर अपनी प्रतिभा का उपयोग पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक जागरूकता, शिक्षा और संस्कृति से जुड़े विषयों को प्रस्तुत करने में करें तो यह समाज के लिए अत्यंत लाभदायक हो सकता है। उदाहरण के लिए, कई युवा अपने वीडियो के माध्यम से स्वच्छता, वृक्षारोपण और पहाड़ों की संस्कृति के संरक्षण का संदेश भी दे रहे हैं।

युवाओं के लिए यह समझना भी आवश्यक है कि लोकप्रियता पाने की जल्दबाजी में कोई भी ऐसा कदम न उठाया जाए जिससे समाज या कानून का उल्लंघन हो। सोशल मीडिया पर मिली प्रसिद्धि तभी सार्थक होती है जब वह सकारात्मक कार्यों और अच्छी सोच के साथ जुड़ी हो।

अंततः यह कहा जा सकता है कि उत्तराखण्ड में रील क्रिएटरों की बढ़ती संख्या एक नई डिजिटल क्रांति का संकेत है। यह युवाओं की रचनात्मकता और तकनीक के उपयोग को दर्शाता है। यदि इसका सही दिशा में उपयोग किया जाए तो यह राज्य की संस्कृति, पर्यटन और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन इसके साथ-साथ जिम्मेदारी, अनुशासन और संवेदनशीलता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। तभी सोशल मीडिया वास्तव में समाज के विकास और सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन सकेगा।

(लेखक लोहाघाट निवासी एवं समसामयिक मुद्दों पर नियमित लिखते है)

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