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20 मार्च को नवरात्र प्रारंभ की तिथि शास्त्र सम्मत। 19 मार्च को अमावस्या 1 घड़ी 22 पला होने के कारण नहीं होगा देव पूजन

रिपोर्ट :लक्ष्मण बिष्ट : 20 मार्च को नवरात्र प्रारंभ की तिथि शास्त्र सम्मत। 19 मार्च को अमावस्या 1 घड़ी 22 पला होने के कारण नहीं होगा देव पूजन

Laxman Singh Bisht

Tue, Mar 17, 2026

20 मार्च को नवरात्र प्रारंभ की तिथि शास्त्र सम्मत। 19 मार्च को अमावस्या 1 घड़ी 22 पला होने के कारण नहीं होगा देव पूजन

तमाम विद्वान पुरोहितों द्वारा शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद लिया यह निर्णय।

लोहाघाट: हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्र को बहुत ही पवित्र पर्व माना जाता है। लेकिन 19 मार्च को सूर्योदय में 6: 53 तक 1घड़ी 53 पला तक अमावस्या होने से भ्रम की स्थिति बन गई है। यही स्थिति पूर्व के वर्षों में भी आई है जिनका अध्ययन और इस स्थित में धर्म ग्रंथों में क्या कुछ कहा गए है की विवेचना कर रहे हैं वेद पुराण एवं ज्योतिषाचार्य प्रकाश पाण्डेय। वे कहते हैं- "धर्मो रक्षति रक्षितः" अर्थात—"धर्म, नैतिकता, कर्तव्य, सदाचार की रक्षा करना ही श्रेष्ठ कर्म है। धर्म से ही देवता और पितृ हैं। प. रामदत्त ज्योतिर्विद श्री गणेश मार्तंड पंचांग में आया है-संवत्सर प्रतिपदा-शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथियुग्म के नियम से यद्यपि अमावास्यायुक्त ग्राह्य है, तथापि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को वर्षारम्भ एवं नवरात्र पूजन का विधान होने से उदया तिथि ही उपयुक्त है- "चैत्र मासि जगद्ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि । शुक्ल पक्षे समग्रं तु तदा सूर्योदये सति।"हेमाद्रौ ब्रह्मोक्ते नवरात्र पूजन हेतु भी "अमायुक्ता न कर्त्तव्या प्रतिपच्चण्डिकार्चने" धर्मसिंधु के अनुसार उदयातिथि ग्राह्य है। प्रतिपदाक्षय की स्थिति में, जैसा कि विगत सम्वत् 2045 में, प्रथम दिन अमायुक्त वत्सरारम्भ अनन्य गतिक है। उसे अपवाद स्वरूप कहेंगे।" अर्थात सूर्योदय में जो तिथि हो उसी तिथि और वही पक्ष पूरे दिन माना जाय। श्री पाण्डेय आगे बताते हैं करीब 40 पुरोहितों कि ऑनलाइन चर्चा और पिछले 40 वर्षों के विभिन्न पंचांगों का अध्ययन में जो निर्णय है इसमें वर्ष 1995 में अमावस्या केवल 2 घड़ी 25 पला थी तब पूरा दिन अमावस्या मानी गई। 1988 में प्रतिपदा क्षय थी, लेकिन द्वितीया और प्रतिपदा एक ही दिन मानी गई। वर्ष 1989 में प्रतिपदा क्षय थी उसमें भी कोई विवाद नहीं हुआ और प्रतिपदा, द्वितीया एक माना गया। वर्ष 1988 में प्रतिपदा क्षय होने पर प्रतिपाद और द्वितीया एक माना गया। 1998 में प्रतिपदा केवल 48 पला थी फिर भी अमावस्या को प्रथम नवरात्रि नहीं मानी गई। वर्ष 2007 में प्रतिपदा क्षय थी तब भी यही माना गया। इसी प्रकार वर्ष 2017 में प्रतिपदा क्षय होने पर अमावस्या पर नवरात्र को नहीं माना गया, लेकिन इस समय में विवाद करना अनुचित है और पूर्व के वर्षों की भांति इस वर्ष भी नवरात्र का निर्णय किया जाना चाहिए़। विगत वर्षों के पंचांगो का अध्ययन के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि इस वर्ष 2026 में ही पूर्व वर्षों को आधार मानते सूर्योदय की तिथि को प्रमाणिक मानकर 20 मार्च को ही प्रतिपदा द्वितीया माना जाना शास्त्र सम्मत है। "उदिते देवतं भानौ पित्रये चास्तमिते रवौ।

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