रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : चंपावत:26 वर्षों से न्याय और अधिकार की प्रतीक्षा कर रहे राज्य आंदोलनकारियों को अब आश्वासन नहीं, ठोस निर्णय की दरकार: भूपेंद्र देव (ताऊ)
Laxman Singh Bisht
बैठकों से आगे बढ़कर अब निर्णय का समय है
26 वर्षों से न्याय और अधिकार की प्रतीक्षा कर रहे राज्य आंदोलनकारियों को अब आश्वासन नहीं, ठोस निर्णय की दरकार: ताऊ
चंपावत। चंपावत जिले के प्रमुख राज्य आंदोलनकारी भूपेंद्र देव (ताऊ) ने कहा उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान, अधिकार और लंबित मांगों को लेकर आज चंपावत जिला सभागार में आयोजित बैठक में बड़ी संख्या में वंचित, सेवारत एवं चिन्हित राज्य आंदोलनकारी अपनी-अपनी पीड़ाएं और समस्याएं लेकर पहुंचे। बैठक में शासन के प्रतिनिधियों के साथ जिला मजिस्ट्रेट मनीष कुमार, एडीएम के.एन. गोस्वामी तथा उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी सम्मान एवं कल्याण परिषद के अध्यक्ष हुकुम सिंह कुँवर की उपस्थिति ने आंदोलनकारियों के भीतर एक बार फिर उम्मीद जगाई।बैठक में पहुंचे आंदोलनकारियों के चेहरों पर वर्षों का संघर्ष साफ दिखाई दे रहा था। वे किसी राजनीतिक लाभ की मांग लेकर नहीं, बल्कि उस राज्य में अपने अधिकार और सम्मान की अपेक्षा लेकर पहुंचे, जिसके निर्माण के लिए उन्होंने अपना जीवन दांव पर लगाया था। उनकी निगाहें शासन के प्रतिनिधियों की ओर थीं और मन में यही विश्वास था कि शायद इस बार उनकी पीड़ा केवल सुनी नहीं जाएगी, बल्कि उस पर कोई ठोस निर्णय भी होगा।राज्य आंदोलनकारियों की सबसे बड़ी पीड़ा यही है कि 26 वर्षों से उनकी मांगों, समस्याओं और अधिकारों को लेकर बैठकों का सिलसिला चलता आ रहा है। मांगें सामने आती हैं, समस्याओं पर चर्चा होती है, आश्वासन मिलते हैं और फिर समय बीत जाता है। अगली बैठक में वही मुद्दे फिर सामने खड़े दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से आंदोलनकारियों के मन में यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि आखिर उनके अधिकारों पर अंतिम निर्णय कब होगा?
आज की बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण रही कि इसमें वंचित राज्य आंदोलनकारियों और सेवारत राज्य आंदोलनकारियों के मामलों को गंभीरता से सामने रखा गया। इन वर्गों की समस्याएं लंबे समय से समाधान की प्रतीक्षा में हैं। बैठक में मेरे द्वारा भी सेवारत एवं वंचित राज्य आंदोलनकारियों की समस्याओं के संबंध में विस्तृत जानकारी शासन के समक्ष रखी गई और इन मामलों के समाधान के लिए ठोस पहल कीआवश्यकता पर जोर दिया गया।राज्य आंदोलनकारियों की अपेक्षा अब बहुत स्पष्ट है कि बैठक हो तो उसके बाद निर्णय भी दिखाई दे।
चर्चा हो तो उसका परिणाम भी सामने आए। सुझाव लिए जाएं तो उनका शासनादेश अथवा ठोस कार्यवाही के रूप में धरातल पर असर दिखाई दे। जिला मजिस्ट्रेट महोदय द्वारा आंदोलनकारियों की समस्याओं और सुझावों को संकलित कर एक ठोस ड्राफ्ट के माध्यम से शासन तक पहुंचाए जाने की पहल की उम्मीद जगी है। यदि यह ड्राफ्ट राज्य आंदोलनकारियों की वास्तविक पीड़ा, लंबित मांगों और विभिन्न श्रेणियों की व्यावहारिक समस्याओं को समग्र रूप से शासन तक पहुंचाने में सफल होता है, तो यह बैठक महज एक औपचारिकता न रहकर समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।राज्य आंदोलनकारियों को अब किसी नई बैठक की तारीख नहीं, बल्कि पुराने सवालों के जवाब चाहिए। उन्हें यह विश्वास चाहिए कि उनके द्वारा वर्षों से उठाई जा रही मांगों को अब फाइलों और बैठकों के दायरे से बाहर निकालकर निर्णय की मेज तक पहुंचाया जाएगा।यह भी उल्लेखनीय है कि राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान और उनके हितों की रक्षा को सरकार की प्राथमिकता बताया गया है। अब आंदोलनकारियों की निगाहें इसी कथन के धरातलीय परिणाम पर हैं। सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अधिकारों की रक्षा और लंबित समस्याओं के समाधान से सार्थक होगा।26 वर्षों की लंबी प्रतीक्षा ने आंदोलनकारियों को थका जरूर दिया है, लेकिन उनके भीतर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष की भावना आज भी जीवित है। उनकी आंखें अब आश्वासनों की नहीं, न्याय के निर्णय की प्रतीक्षा कर रही हैं।आज की बैठक से उम्मीद इसलिए बंधी है कि शायद अब बैठकों का दौर किसी निष्कर्ष तक पहुंचेगा। शायद लंबित मामलों पर गंभीरता से विचार होगा। शायद वंचित और सेवारत राज्य आंदोलनकारियों की पीड़ा को शासन स्तर पर प्राथमिकता मिलेगी। और शायद इस बार आंदोलनकारियों को फिर से अपनी वही मांगें लेकर अगली बैठक में नहीं बैठना पड़ेगा।लेकिन यह उम्मीद तभी विश्वास में बदलेगी, जब बैठक के बाद ठोस कार्यवाही, स्पष्ट समयसीमा और निर्णय सामने आएगा।राज्य आंदोलनकारियों ने उत्तराखंड बनाया है,अब आवश्यकता इस बात की है कि उत्तराखंड की सरकार भी उनके संघर्ष और योगदान के अनुरूप उनके सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए निर्णायक कदम उठाए।अब समय बैठकों को गिनने का नहीं, निर्णयों के परिणाम देखने का है।
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