Thursday 9th of July 2026

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रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट 👹👹 : चंपावत:जंगलों में आग लगने का मुख्य कारक पिरुल अब उगलने लगा है पैसा। रोजगार का बना सशक्त माध्यम।

Laxman Singh Bisht

Sun, May 18, 2025

यू-कॉस्ट एवं वन विभाग के बीच हुए सहयोग व समन्वय के अनुबंध को मिल रही है, शुरुआत में ही सफलता। चंपावत। जिले में वन विभाग एवं उत्तराखंड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद यू-कॉस्ट के बीच ऐसे कौन से समय में मुहूर्त निकाल कर वनों को आग से बचाने एवं महिलाओं को रोजगार देने का आपसी सहयोग एवं समन्वय का अनुबंध किया है, जिसको शुरुआती सफलता मिलने के साथ अब मॉडल जिले में असम से आयात किए जाने वाला बाँस, यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती की एक और कड़ी बनने जा रहा है। यू-कॉस्ट के महानिदेशक दुर्गेश पंत एवं डीएफओ नवीन चंद्र पंत द्वारा इस दिशा में किए गए प्रयास जो रंग दिखा रहे हैं उसे देखते हुए यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि यदि दृढ़ इच्छा शक्ति एवं मजबूत इरादों को लेकर सहयोग एवं समन्वय से कार्य किया जाए तो सफलता पाव छूने लगेगी। भिंगराडा में दोनों विभागों के सहयोग से पिरुल की ब्रिकेटिंग बनाने का कार्य इतनी तेजी से चल रहा है कि अब यहां संयंत्र की उत्पादन क्षमता में वृद्धि व क्रेशरों की संख्या बढ़ाने की तात्कालिक आवश्यकता हो गई है। इस बात को यू-कॉस्ट के वैज्ञानिक डॉ कपिल जोशी ने देर शाम किये दौरे के दौरान अनुभव किया। यहां ग्राम प्रधान गीता भट्ट, आईआईपी व वन विभाग के कर्मियों द्वारा देर तक कार्य करते हुए देखा गया। डॉ जोशी ने वन कर्मियों व संचालकों से सीधा संवाद स्थापित कर इस कार्य में आ रही दिक्कतो व उनकी आवश्यकताओं की जानकारी प्राप्त की। इधर डीएफओ नवीन पंत ने यू-कॉस्ट के सहयोग से चंपावत जिले में बाँस की व्यापारिक खेती की शुरुआत करने के लिए नर्सरी स्थापित करने की कार्यशाला का शुभारंभ किया। पूर्ण रूप से तैयार महिला रोजगार से जुड़े इस कार्यक्रम को ऐसा स्वरूप देने की पहल की गई है कि “आम के आम गुठली के दाम” देने की कहावत को चरितार्थ करते हुए बाँस के उत्पादन को हर दृष्टि से फायदेमंद है जो यहां की जलवायु में व्यापक स्तर पर पैदा किया जा सकता है। श्री पंत ने कहा अभी तक असम से बाँस को आयात किया जाता था। वह दिन दूर नहीं जब चंपावत मॉडल जिला उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में बाँस के उत्पादन की दृष्टि से प्रथम पंक्ति में खड़ा होगा। बाँस के पीछे रोजगार की अपार संभावनाएं तो छुपी हुई है, यह पर्यावरण संरक्षण पशुचारे एवं वनों के कटान को रोकने में भी काफ़ी मददगार साबित होगा। स्वायक्त सहकारी समिति की विशेषज्ञ डॉ प्रांजिका बिष्ट, डॉ विपिन सती, देवेंद्र सिंह, संतोष कर्नाटक, डॉ कमलेश ने महिलाओं को प्रशिक्षण दिया। शुरुआती दौर में 50 महिलाओं द्वारा बाँस की नर्सरी तैयार करने का प्रशिक्षण लिया गया।

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