रिपोर्ट :लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट:गरीबी के बीच संकल्प, गुरु के मार्गदर्शन और बहन के त्याग ने बदली पूरे परिवार की तकदीर।
Laxman Singh Bisht
गरीबी के बीच संकल्प, गुरु के मार्गदर्शन और बहन के त्याग ने बदली पूरे परिवार की तकदीर।

संघर्ष से सफलता तक: बड़ी बहन बनी सहारा, निशा ने वन आरक्षी बन रचा इतिहास।

लोहाघाट। कहा जाता है कि अगर परिवार में अच्छे संस्कार, दृढ़ इच्छाशक्ति और सही मार्गदर्शन हो, तो अभाव भी सफलता की राह नहीं रोक सकते। लोहाघाट क्षेत्र के रेगडूं के छंदा गांव की रहने वाली निशा ने इस कहावत को सच कर दिखाया है। नरेश सिंह और हेमा देवी की बेटी निशा ने विपरीत परिस्थितियों में न केवल खुद को संभाला, बल्कि पूरे परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाई। चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण निशा ने छोटी उम्र में ही माता-पिता का सहारा बनते हुए परिवार को संवारने का काम किया।आर्थिक तंगी और सीमित संसाधनों के बावजूद निशा ने हिम्मत नहीं हारी। इसी दौरान निशा के मौसी के लड़के रायकोट महर के महेंद्र महर ने उसकी मुलाकात सही माइनो में युवाओं के मार्गदर्शक संजय देव से कराई, जिन्होंने निशा के जीवन की दिशा ही बदल दी। संजय देव ने निःशुल्क मार्गदर्शन और सहयोग देकर निशा को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार किया। उनकी मेहनत और मार्गदर्शन का परिणाम यह रहा कि निशा का चयन यूकेएसएसएससी की परीक्षा में वन आरक्षी पद पर हो गया। यह सफलता न केवल निशा के लिए, बल्कि पूरे परिवार के लिए एक नई शुरुआत साबित हुई। संजय देव ने यहीं रुककर नहीं, बल्कि निशा के भाइयों अंकित और करण का भी मार्गदर्शन किया। उनके प्रयासों से अंकित का चयन कनिष्ठ सहायक और करण का चयन पुलिस आरक्षी के पद पर हुआ। वहीं सबसे छोटी बहन नीतू अब उच्च प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटी हुई है।निशा और उसके भाई-बहनों का कहना है कि माता-पिता ने उन्हें जन्म दिया, लेकिन उनके जीवन को नई दिशा और मुकाम देने का कार्य संजय सर ने किया है। उनके प्रति आभार व्यक्त करने के लिए उनके पास शब्द नहीं हैं। वहीं संजय देव का कहना है कि वह केवल एक माध्यम हैं। जरूरतमंद और प्रतिभाशाली युवाओं की मदद करना ही उनका उद्देश्य है और उन्हें यह प्रेरणा ईश्वर से मिलती है। उन्होंने सैकड़ों युवाओं को निःशुल्क मार्गदर्शन देकर उनके जीवन को नई दिशा दी है। संजय सर का कहना है कि उन्हें इस बात की प्रसन्नता है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा इमानदारी से परिक्षाओं का संचालन किए जाने के कारण ऐसे गरीब युवक और युवतियों को उनका सही मुकाम मिलता जा रहा है। निशा की यह कहानी महिला सशक्तिकरण, पारिवारिक जिम्मेदारी और सही मार्गदर्शन के महत्व का जीवंत उदाहरण है, जो यह संदेश देती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर हौसले बुलंद हों तो सफलता जरूर मिलती है।
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