: लोहाघाट के अद्वैत आश्रम मायावती में धूम धाम से मनायी गई स्वामी विवेकानंद जी की 163 वीं जन्मतिथि
Laxman Singh Bisht
Tue, Jan 21, 2025
लोहाघाट के अद्वैत आश्रम मायावती में धूम धाम से मनायी गई स्वामी विवेकानंद जी की 163 वीं जन्मतिथि
जनपद चम्पावत के लोहाघाट स्थित अद्वैत आश्रम मायावती में स्वामी विवेकानंद जी की जन्मतिथि को बेहद ही धूमधाम के साथ मनाया गया।इस अवसर पर हुए कार्यक्रम में स्वामी विवेकानंद जी के जीवन पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला गया और कार्यक्रम के अंत में विशाल भंडारे का आयोजन आश्रम में किया गया जिसमे लोहाघाट,चम्पावत,फ़ोरती,बिशंग समेत आसपास के सैकड़ों लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया। रामकृष्ण मिशन एवं अद्वैत आश्रम से जुड़ाव रखने वाले लोहाघाट के शशांक पांडेय ने जानकारी देते हुए बताया कि यूँ तो स्वामी विवेकानंद जी की जन्मदिन 12 जनवरी को देश विदेश में बनाया जाता है लेकिन रामकृष्ण मिशन एवं उससे जुड़े हुए देश विदेश के केंद्रों में यह आयोजन भारतीय पंचांग अनुसार तिथि को देखते हुए मनाया जाता है जिस कारण आज पौष कृष्ण सप्तमी को यह जन्मतिथि कार्यक्रम आयोजित हुआ। आश्रम के स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराजने अपने उद्बोधन में स्वामी विवेकानंद जी के जीवन दर्शन पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला।
स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराज ने बताया कि स्वामी विववेकानंद जी का जीवन काल वैसे तो बहुत छोटा रहा परंतु उन्होंने इस छोटे जीवन काल में ही संपूर्ण जीवन जी लिया था और इतने छोटे काल में ही उन्होंने इस देश, समाज और धर्म को बहुत कुछ दिया। उन्होंने आगे बताया कि स्वामी जी अपनी जिज्ञासाएं शांत करने के लिए ब्रह्म समाज के अलावा कई साधु-संतों के पास गये और अंतत: वे रामकृष्ण परमहंस की शरण में गए। रामकृष्ण के रहस्यमय व्यक्तित्व ने उन्हें प्रभावित किया, जिससे उनका जीवन बदल गया और रामकृष्ण को उन्होंने अपना गुरु बनाया। संन्यास लेने के बाद उनका नाम विवेकानंद हुआ।
स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराज ने बताया कि रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर वह उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे किंतु रामकृष्ण परमहंस जी ने देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार है। परमहंसजी की कृपा से उनको आत्म-साक्षात्कार हुआ जिसके फलस्वरूप वह परमहंसजी के शिष्यों में प्रमुख हो गए। स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराज ने बताया कि स्वामी विवेकानंद ने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। गरीब, निर्धन और सामाजिक बुराई से ग्रस्त देश के हालात देखकर वह दुःख और दुविधा में रहे। उसी दौरान उन्हें सूचना मिली कि शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है।स्वामी विवेकानंदजी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुंचे। उन्होंने बताया कि यूरोप अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। उन्होंने क़िस्सा बताया कि एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला और उसके बार पूरे विश्व ने भारत की मेघा को पहचाना। स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराज ने कर्मयोग, ज्ञानयोग,भक्ति योग और राजयोग पर भी जानकारी दी।स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराज ने मौजूद लोगो से स्वामी विवेकानंद जी के विचारों को जीवन में उतारने पर बल दिया।उद्बोधन के बाद विशाल भंडारा आयोजित हुआ। कार्यक्रम में स्वामी गुणोंतमानंद जी,स्वामी एकदेवानंद,भास्कर मुरारी, सतीश पाण्डे, कुलदीप देव, विनोद बगौली,कीर्ति बगौली,त्रिभुवन उपाध्याय,जगदीश अधिकारी, प्रदीप ढेक, शेखर पुनेठा,सुमित पुनेठा, कमल सिंह,विजय पुनेठा,बसंत पंगरिया समेत सैकड़ों लोग मौजूद रहे।
जनपद चम्पावत के लोहाघाट स्थित अद्वैत आश्रम मायावती में स्वामी विवेकानंद जी की जन्मतिथि को बेहद ही धूमधाम के साथ मनाया गया।इस अवसर पर हुए कार्यक्रम में स्वामी विवेकानंद जी के जीवन पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला गया और कार्यक्रम के अंत में विशाल भंडारे का आयोजन आश्रम में किया गया जिसमे लोहाघाट,चम्पावत,फ़ोरती,बिशंग समेत आसपास के सैकड़ों लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया। रामकृष्ण मिशन एवं अद्वैत आश्रम से जुड़ाव रखने वाले लोहाघाट के शशांक पांडेय ने जानकारी देते हुए बताया कि यूँ तो स्वामी विवेकानंद जी की जन्मदिन 12 जनवरी को देश विदेश में बनाया जाता है लेकिन रामकृष्ण मिशन एवं उससे जुड़े हुए देश विदेश के केंद्रों में यह आयोजन भारतीय पंचांग अनुसार तिथि को देखते हुए मनाया जाता है जिस कारण आज पौष कृष्ण सप्तमी को यह जन्मतिथि कार्यक्रम आयोजित हुआ। आश्रम के स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराजने अपने उद्बोधन में स्वामी विवेकानंद जी के जीवन दर्शन पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला।
स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराज ने बताया कि स्वामी विववेकानंद जी का जीवन काल वैसे तो बहुत छोटा रहा परंतु उन्होंने इस छोटे जीवन काल में ही संपूर्ण जीवन जी लिया था और इतने छोटे काल में ही उन्होंने इस देश, समाज और धर्म को बहुत कुछ दिया। उन्होंने आगे बताया कि स्वामी जी अपनी जिज्ञासाएं शांत करने के लिए ब्रह्म समाज के अलावा कई साधु-संतों के पास गये और अंतत: वे रामकृष्ण परमहंस की शरण में गए। रामकृष्ण के रहस्यमय व्यक्तित्व ने उन्हें प्रभावित किया, जिससे उनका जीवन बदल गया और रामकृष्ण को उन्होंने अपना गुरु बनाया। संन्यास लेने के बाद उनका नाम विवेकानंद हुआ।
स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराज ने बताया कि रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर वह उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे किंतु रामकृष्ण परमहंस जी ने देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार है। परमहंसजी की कृपा से उनको आत्म-साक्षात्कार हुआ जिसके फलस्वरूप वह परमहंसजी के शिष्यों में प्रमुख हो गए। स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराज ने बताया कि स्वामी विवेकानंद ने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। गरीब, निर्धन और सामाजिक बुराई से ग्रस्त देश के हालात देखकर वह दुःख और दुविधा में रहे। उसी दौरान उन्हें सूचना मिली कि शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है।स्वामी विवेकानंदजी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुंचे। उन्होंने बताया कि यूरोप अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। उन्होंने क़िस्सा बताया कि एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला और उसके बार पूरे विश्व ने भारत की मेघा को पहचाना। स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराज ने कर्मयोग, ज्ञानयोग,भक्ति योग और राजयोग पर भी जानकारी दी।स्वामी शांतचित्तानन्द जी महाराज ने मौजूद लोगो से स्वामी विवेकानंद जी के विचारों को जीवन में उतारने पर बल दिया।उद्बोधन के बाद विशाल भंडारा आयोजित हुआ। कार्यक्रम में स्वामी गुणोंतमानंद जी,स्वामी एकदेवानंद,भास्कर मुरारी, सतीश पाण्डे, कुलदीप देव, विनोद बगौली,कीर्ति बगौली,त्रिभुवन उपाध्याय,जगदीश अधिकारी, प्रदीप ढेक, शेखर पुनेठा,सुमित पुनेठा, कमल सिंह,विजय पुनेठा,बसंत पंगरिया समेत सैकड़ों लोग मौजूद रहे।