रिपोर्ट: लक्ष्मण बिष्ट : बाराकोट:रेगड़ू क्षेत्र के शिव मन्दिर में स्थापित वीर खम्ब बयां करते वीरता और पूर्वजो का इतिहास। चंद शासनकाल से हैं संबंध
Laxman Singh Bisht
Tue, May 19, 2026
रेगड़ू क्षेत्र के शिव मन्दिर में स्थापित वीर खम्ब बयां करते वीरता और पूर्वजो का इतिहास
उत्तराखंड के चम्पावत जनपद (बाराकोट ब्लॉक) के अंतर्गत आने वाले रेगड़ू शिव मन्दिर (रेगड़ू महादेव) परिसर में स्थित वीरखाम्ब (वीरखंभ / बिरखम) प्राचीन कत्यूरी शासन पश्चात् चन्द राजवंश के काल की स्थापत्य कला, शौर्य और लोक-संस्कृति के अद्भुत प्रतीक है!वीरखंभ' वास्तव में 'विजय स्तंभ' या 'कीर्ति स्तंभ' होते हैं। ये पत्थर के नक्काशीदार खंभे होते हैं, जिन्हें प्राचीन काल में राजाओं, स्थानीय सेनापतियों या वीर योद्धाओं की स्मृति, शौर्य और किसी विशेष युद्ध में मिली विजय को अमर रखने के लिए स्थापित किया जाता था। रेगड़ू महादेव और उसके आसपास के वीरखंभों का संबंध चंद शासनकाल से माना जाता है।
इस क्षेत्र में जब भी कोई वीर योद्धा अपनी मातृभूमि या राजा के लिए लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होता था, तो उसकी याद में इस तरह के प्रस्तर स्तंभ (पत्थर के खंभे) खड़े किए जाते थे। समय के साथ इन वीरखंभों को लोक मान्यताओं और धार्मिक मान्यता अनुसार लोक देवताओं के रूप में पूजा जाने लगा। रेगड़ू महादेव (भगवान शिव मन्दिर ) के सानिध्य में होने के कारण इन्हें अत्यंत पवित्र माना जाता है। स्थानीय लोग इन्हें अपने पूर्वजों और क्षेत्र के रक्षकों के प्रतीक के रूप में पूजते हैं।

रेगड़ू क्षेत्र के सबसे बुजुर्ग नागरिक 101 वर्षीय रिटायर्ड प्रधानाध्यापक मोती सिंह मेहता के अनुसार कत्युरी शासन पश्चात् लगभग तेरहवी शताब्दी में हम महत लोग चन्दवंशी थे जिन्हे बाद में मेहता कहां गया! मेहता लोगो के पूर्वज राम सिंह चंद चम्पावत से रेगड़ू आया! आते समय कहते है कि मानेश्वर में जो देवदार पेड़ है उसी का लगाया हुआ है जिसे अभी भीं रमई दयार कहते है!रेगड़ू आने पर उसके दो बेटे ज्ञान चंद और ध्यान चंद हुए! ज्ञान चंद को राई और चाक मेहता गाँव का पूर्वज माना जाता है. तथा ध्यान चंद को छन्दा और खकोड़ा गाँव का पूर्वज माना जाता है! उल्लेखनीय है कि नौ गाँव रेगड़ू में चार गाँव मेहता लोगो के है!

मन्दिर परिसर में स्थापित इन खंभों पर अक्सर त्रिशूल, तलवार, ढाल या प्राचीन लिपि में कुछ आकृतियां उकेरी हुई है! कुमाऊं के इतिहास में 'वीरखाम्ब' उन भारी-भरकम, नक्काशीदार पत्थर के खंभों को कहा जाता है, जिन्हें प्राचीन काल में युद्ध में अद्भुत वीरता दिखाने वाले योद्धाओं (वीरों) की स्मृति में या किसी विशेष विजय के उपलक्ष्य में स्थापित किया जाता था।
