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लोहाघाट:विश्व गौरैया दिवस पर बातों-बातों में:-भगवत प्रसाद पांडे /विलुप्त की कगार पर नन्ही गौरैया e

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रिपोर्ट: लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट:विश्व गौरैया दिवस पर बातों-बातों में:-भगवत प्रसाद पांडे /विलुप्त की कगार पर नन्ही गौरैया e

Laxman Singh Bisht

Fri, Mar 20, 2026

विश्व गौरैया दिवस पर बातों-बातों में:-भगवत प्रसाद पांडे

विलुप्त की कगार पर नन्ही गौरैया छोटी चिड़िया, बड़ी चिंता सुबह की हल्की धूप आँगन में उतरती है और कहीं पास से “चिर्र-चिर्र” की मीठी आवाज़ सुनाई देती है। छोटी-सी गौरैया फुदकती हुई आती है, कुछ दाने चुगती है और पल भर में उड़ जाती है। कभी यह दृश्य हमारे घर-आँगनों की रोज़मर्रा की पहचान था, लेकिन आज यह नन्हीं चिड़िया और उसकी चहचहाहट दोनों ही धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही हैं। हर वर्ष 20 मार्च को 'विश्व गौरैया दिवस' मनाया जाता है। यह दिन उस नन्हीं घरेलू चिड़िया को समर्पित है, जो कभी हमारे घरों, आँगनों और खेत-खलिहानों की सबसे परिचित साथी हुआ करती थी। इस दिवस का उद्देश्य केवल एक पक्षी को याद करना नहीं, बल्कि उसके संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक करना भी है। गौरैया की चुलबुली चहचहाहट कभी हमारी सुबह की पहली आवाज़ हुआ करती थी। सूरज की पहली किरण के साथ उसका कलरव हर घर में गूँज उठता था और शाम ढलते समय पेड़ों या छतों के आसपास उसका मधुर स्वर वातावरण को जीवंत बना देता था। सच तो यह है कि उसके बिना घर-आँगन की सुबह और शाम अधूरी-सी लगती थी। कुछ दशक पहले तक गौरैया लगभग हर घर की मेहमान होती थी। पहाड़ों और मैदानों के गाँवों और कस्बों में कच्चे-पक्के घरों की दीवारों, खपरैल की छतों और लकड़ी के तख्तों के बीच किसी सुरक्षित दरार या छोटे से छिद्र में वह आसानी से अपना घोंसला बना लेती थी। घर की महिलाएँ आँगन में चावल या गेहूँ के दाने डाल देती थीं, जिन्हें चुगते हुए गौरैया बच्चों के साथ फुदक-फुदक कर खेलती-सी प्रतीत होती थी। छोटे बच्चे भी बड़े प्रेम से उसे दाना-पानी देते थे। कई घरों में तो गौरैया को परिवार के सदस्य जैसा स्नेह मिलता था परन्तु बदलते समय के साथ यह परिचित चिड़िया धीरे-धीरे हमारे घर-आँगनों से ही नहीं, बल्कि हमारी आँखों से भी ओझल होने लगी है। शहरों में तो गौरैया का दिखना अब बहुत दुर्लभ हो गया है और गाँवों में भी उसकी संख्या पहले की तुलना में काफी कम हो गई है।इसके पीछे कई आधुनिक कारण जिम्मेदार माने जाते हैं। कंक्रीट के घरों में उनके घोंसलों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं बचा है और बहुमंज़िला इमारतों में भी उन्हें सुरक्षित कोना नहीं मिल पाता। खेती में कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग से छोटे-छोटे कीड़े कम हो रहे हैं, जो गौरैया के भोजन का मुख्य स्रोत हैं। मोबाइल टावरों से निकलने वाले विकिरण को भी कुछ विशेषज्ञ इसके पीछे एक कारण मानते हैं। इसके अलावा पेड़ों की कटाई, झाड़ियों का समाप्त होना और तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण भी उनके प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर रहा है ।गौरैया का कम होना केवल एक पक्षी का कम होना नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के बदलते संतुलन का संकेत भी है। इसलिए आवश्यक है कि हम इस छोटी-सी चिड़िया के संरक्षण के लिए छोटे-छोटे प्रयास करें। अपने घरों की छतों, आँगनों या बालकनी में दाना-पानी रखना, पेड़-पौधे लगाना और कृत्रिम घोंसलों की व्यवस्था करना जैसे सरल कदम गौरैया के लिए बहुत सहायक हो सकते हैं। साथ ही बच्चों को भी प्रकृति और पक्षियों के प्रति संवेदनशील बनाना समय की आवश्यकता है।विश्व गौरैया दिवस हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति की सुंदरता और पर्यावरण के संतुलन में इन छोटे-छोटे पक्षियों का भी महत्वपूर्ण योगदान है। यदि हम आज थोड़ा-सा प्रयास करें, तो शायद आने वाले समय में फिर से हमारे आँगन में गौरैया की वही मधुर चहचहाहट सुनाई दे—जो कभी हमारे बचपन और हमारे घरों की पहचान हुआ करती थी।

■भगवत प्रसाद पाण्डेय

पाटन-पाटनी (लोहाघाट)

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