: लोहाघाट: मेहता मास्साब 18वी लोकसभा के लिए देंगे वोट।
Laxman Singh Bisht
Sun, Apr 7, 2024
अबकी बार मेहता मास्साब 18वी लोकसभा के लिए देंगे वोट।
जीवन के 98 वसंत देख चुके मूलरूप से ग्राम चाक रेगङू निवासी हाल ठाडाढुंगा लोहाघाट में रह रहे सेवानिवृत्त हेड मास्साब मोती सिंह मेहता इस दफा 18वी लोकसभा के लिए भी अपना वोट डालेंगे। 1952 में हुए पहले आम चुनाव के बाद लगातार वोट देते आ रहे मास्साब भारतीय राजनीति में आए बदलाव के ऐसे साक्षी है जो हर उतार चढ़ाव , परिस्थितियों में आए बदलाव के साक्षी बने हुए है। मास्साब से अधिक वोट के अधिकार कौन जानता है ? उनका कहना है जिस प्रकार मां का बेटों के लिए समान व्यवहार एवं प्रकृति सब का समान रूप से उपकार करती है ठीक इसी प्रकार हमारे संविधान ने सबको समान अधिकार दिए है। वोट चाहे राजा का हो या प्रजा का हो सभी का मूल्य बराबर होता है। मासाब शुरू से ही लोगो को अपने स्तर से वोट के लिए लोगों को जागरूक करते आ रहे है। वे बताते है कि प्रथम आम चुनाव से अब 18 वी लोकसभा के चुनाव में बहुत कुछ परिवर्तन हो गया है। तेजी से घूमते समय चक्र के साथ चुनाव लड़ने व चुनाव प्रचार का तरीका भी तेजी से बदला है। पहले नेता लोग पैदल भ्रमण करते , पोस्टकार्ड, चिट्ठी आती थी, चौपाल लगाकर जनसंपर्क करते थे, गांवो में गुड़ चाय, का आनंद लेकर सयानो से संपर्क संवाद करते थे, युवा लोग भी सयानों की ही बात मानते थे, उन्ही की राय पर मतदान करते थे। जब रेडियो से उस प्रत्याशी के जितने की खबर मिलती जिसे उसने वोट दिया था तो लोग खुश हो जाते थे।उन दिनों गांवो में एकाद लोगों के पास बमुश्किल रेडियो होता था।अब चुनाव गाड़ियों, प्रिंट मीडिया व सोशल मीडिया पर ज्यादा आधारित हो गया है। पहले प्रत्याशी वोटरों से आत्मीयता का रिश्ता बनाते थे। वहीं, वोटर भी प्रत्याशी को चुनाव खर्च के लिए चंदा देते थे। वोट मांगने गए प्रत्याशी से लेकर कार्यकर्ताओं तक के भोजन का इंतजाम वोटर के घर होता था।पहले की तुलना में अब चुनाव लड़ना बहुत खर्चीला हो गया है। जो हर किसी के बूते की बात नहीं है। इसी के साथ राजनैतिक दलों में बहुत बड़ी विकृति आती जा रही है।राष्ट्र की अस्मिता को भी दांव में रखकर चुनाव जीतने की हथकंडे अपनाए जा रहे है।चुनाव प्रचार के दौरान एक प्रत्याशी दूसरे प्रत्याशी को नीचा दिखाने के लिए कीचड़ उछालने से परहेज नहीं कर रहे हैं। चुनावो में धन बल, बाहुबल का बोलबाला अनंतस्वरूप लेता जा रहा है। सबसे दुःखद पहलू यह है कि राजनेता कुर्सी के लिए युवा पीढ़ी को नशे की गिरफ्त में लाने से भी परहेज न कर समाज व परिवारों के लिए दुश्मन जैसा व्यवहार कर रहे है।
जीवन के 98 वसंत देख चुके मूलरूप से ग्राम चाक रेगङू निवासी हाल ठाडाढुंगा लोहाघाट में रह रहे सेवानिवृत्त हेड मास्साब मोती सिंह मेहता इस दफा 18वी लोकसभा के लिए भी अपना वोट डालेंगे। 1952 में हुए पहले आम चुनाव के बाद लगातार वोट देते आ रहे मास्साब भारतीय राजनीति में आए बदलाव के ऐसे साक्षी है जो हर उतार चढ़ाव , परिस्थितियों में आए बदलाव के साक्षी बने हुए है। मास्साब से अधिक वोट के अधिकार कौन जानता है ? उनका कहना है जिस प्रकार मां का बेटों के लिए समान व्यवहार एवं प्रकृति सब का समान रूप से उपकार करती है ठीक इसी प्रकार हमारे संविधान ने सबको समान अधिकार दिए है। वोट चाहे राजा का हो या प्रजा का हो सभी का मूल्य बराबर होता है। मासाब शुरू से ही लोगो को अपने स्तर से वोट के लिए लोगों को जागरूक करते आ रहे है। वे बताते है कि प्रथम आम चुनाव से अब 18 वी लोकसभा के चुनाव में बहुत कुछ परिवर्तन हो गया है। तेजी से घूमते समय चक्र के साथ चुनाव लड़ने व चुनाव प्रचार का तरीका भी तेजी से बदला है। पहले नेता लोग पैदल भ्रमण करते , पोस्टकार्ड, चिट्ठी आती थी, चौपाल लगाकर जनसंपर्क करते थे, गांवो में गुड़ चाय, का आनंद लेकर सयानो से संपर्क संवाद करते थे, युवा लोग भी सयानों की ही बात मानते थे, उन्ही की राय पर मतदान करते थे। जब रेडियो से उस प्रत्याशी के जितने की खबर मिलती जिसे उसने वोट दिया था तो लोग खुश हो जाते थे।उन दिनों गांवो में एकाद लोगों के पास बमुश्किल रेडियो होता था।अब चुनाव गाड़ियों, प्रिंट मीडिया व सोशल मीडिया पर ज्यादा आधारित हो गया है। पहले प्रत्याशी वोटरों से आत्मीयता का रिश्ता बनाते थे। वहीं, वोटर भी प्रत्याशी को चुनाव खर्च के लिए चंदा देते थे। वोट मांगने गए प्रत्याशी से लेकर कार्यकर्ताओं तक के भोजन का इंतजाम वोटर के घर होता था।पहले की तुलना में अब चुनाव लड़ना बहुत खर्चीला हो गया है। जो हर किसी के बूते की बात नहीं है। इसी के साथ राजनैतिक दलों में बहुत बड़ी विकृति आती जा रही है।राष्ट्र की अस्मिता को भी दांव में रखकर चुनाव जीतने की हथकंडे अपनाए जा रहे है।चुनाव प्रचार के दौरान एक प्रत्याशी दूसरे प्रत्याशी को नीचा दिखाने के लिए कीचड़ उछालने से परहेज नहीं कर रहे हैं। चुनावो में धन बल, बाहुबल का बोलबाला अनंतस्वरूप लेता जा रहा है। सबसे दुःखद पहलू यह है कि राजनेता कुर्सी के लिए युवा पीढ़ी को नशे की गिरफ्त में लाने से भी परहेज न कर समाज व परिवारों के लिए दुश्मन जैसा व्यवहार कर रहे है।