रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट:राज्य आंदोलनकारियो की पीड़ा मुख्यमंत्री के नाम राज्य आंदोलनकारी भूपेंद्र देव ( ताऊ )का खुला पत्र अब तारीख नहीं, न्याय चाहिए!
Laxman Singh Bisht
राज्य आंदोलनकारियो की पीड़ा मुख्यमंत्री के नाम राज्य आंदोलनकारी भूपेंद्र देव ( ताऊ )का खुला पत्र
अब तारीख नहीं, न्याय चाहिए!
चंपावत जिले के लोहाघाट क्षेत्र के प्रमुख राज्य आंदोलनकारी भूपेंद्र देव (ताऊ) ने राज्य आंदोलनकारियो की पीड़ा बयां करते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर से धामी को पत्र लिखा है। पत्र में लिखा गया है मुख्यमंत्री जी,बड़े दुख, पीड़ा और भारी मन से यह खुला पत्र आपको लिख रहा हूं।आज मन में एक ही सवाल बार-बार उठ रहा है—जिस उत्तराखंड के निर्माण के लिए हजारों लोगों ने संघर्ष किया, क्या उसी उत्तराखंड में राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों को अपने अधिकार के लिए वर्षों तक भटकना पड़ेगा?माननीय मुख्यमंत्री जी, यह सवाल किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है।यह सवाल व्यवस्था से है।यह सवाल न्याय से है।और सबसे बढ़कर यह सवाल उन शहीदों की शहादत से है, जिनके बलिदान की नींव पर उत्तराखंड खड़ा है। मुख्यमंत्री जी, आपके आदेश के बाद भी यदि अधिकारी नहीं जागते तो आम आदमी कहां जाए?
आपके स्तर से सेवारत राज्य आंदोलनकारियों के आश्रितों को भी राज्य आंदोलनकारी के आश्रित के रूप में प्रमाण पत्र जारी करने के संबंध में अधिकारियों को निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है।यदि मुख्यमंत्री के आदेश के बाद भी किसी पात्र परिवार को उसका अधिकार नहीं मिलता, तो फिर यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर शासन की शक्ति कहां समाप्त हो जाती है और प्रशासनिक मनमानी कहां से शुरू हो जाती है?क्या सरकार का आदेश केवल कागज पर जारी होने के लिए है?क्या अधिकारी उसकी व्याख्या अपनी सुविधा के अनुसार करेंगे?क्या शासन द्वारा स्वीकृत व्यवस्था को लागू कराने के लिए भी आंदोलनकारियों को संघर्ष करना पड़ेगा? मुख्यमंत्री जी, यदि ऐसा है तो यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं है—यह शासन और जनता के बीच विश्वास का संकट है।महामहिम राज्यपाल की स्वीकृति और प्रवर समिति के अनुमोदन के बाद भी यदि अधिकार अटका है तो जवाब कौन देगा?बताया गया है कि महामहिम राज्यपाल, उत्तराखंड शासन तथा प्रवर समिति की स्वीकृति/अनुमोदन एवं हस्ताक्षर के उपरांत संबंधित व्यवस्था के लिए अधिनियम/प्रावधान पारित किया गया।यदि विधिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और फिर भी पात्र आंदोलनकारी परिवार अपने अधिकार से वंचित हैं, तो मुख्यमंत्री जी, सवाल उठना स्वाभाविक है कि फिर अड़चन कहां है?कौन-सी फाइल रास्ते में अटकी है?किस स्तर पर निर्णय लंबित है?किस अधिकारी को क्या निर्णय लेना है?और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कब तक निर्णय होगा?जनता को अब अस्पष्ट जवाब नहीं चाहिए।उसे स्पष्ट समय सीमा चाहिए।जिलाधिकारी कार्यालयों में धूल खाती फाइलें सिर्फ कागज नहीं हैं मुख्यमंत्री जी,किसी अधिकारी की मेज पर रखी फाइल शायद सिर्फ एक सरकारी दस्तावेज हो।लेकिन उस फाइल के पीछे एक परिवार का भविष्य हो सकता है।उसमें किसी आंदोलनकारी की वर्षों की प्रतीक्षा हो सकती है।किसी वृद्ध की उम्मीद हो सकती है।किसी परिवार की प्रतिष्ठा जुड़ी हो सकती है।और किसी शहीद के परिवार की आंखों में यह सवाल हो सकता है कि “क्या हमारे बलिदान की कोई कीमत थी?”वंचित राज्य आंदोलनकारियों से संबंधित सूची यदि जिलाधिकारी कार्यालयों में वर्षों से लंबित पड़ी है, तो उसे निकालना किसकी जिम्मेदारी है?क्या फाइलों पर धूल जमती रहे और आंदोलनकारी कार्यालयों के चक्कर काटते रहें?नहीं मुख्यमंत्री जी। यह स्थिति बदलनी होगी।“तारीख पर तारीख” से न्याय नहीं मिलता राज्य आंदोलनकारी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसे अपने योगदान का प्रमाण देने के लिए हर दरवाजे पर दस्तक देनी पड़े।जिसने राज्य निर्माण के संघर्ष में अपना योगदान दिया, उसके परिवार को सम्मानपूर्वक सुना जाना चाहिए।हर बार नई तारीख देना समाधान नहीं है।हर बार नई समिति बनाना समाधान नहीं है।हर बार नई प्रक्रिया बताना समाधान नहीं है।समाधान केवल एक है कि पात्रता की निष्पक्ष जांच और समयबद्ध निर्णय।माननीय मुख्यमंत्री जी, अगर किसी मामले में पात्रता नहीं बनती है तो कारण लिखित रूप में बताया जाए।अगर पात्रता बनती है तो प्रमाण पत्र जारी किया जाए।लेकिन किसी को अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा में रखना न्याय नहीं है।मुख्यमंत्री जी, एक बार उन शहीद परिवारों की आंखों में देखिए कभी उन परिवारों के बीच बैठिए।उनकी बातें सुनिए।उनके वर्षों पुराने दस्तावेज देखिए।उनकी प्रतीक्षा देखिए।शायद तब समझ आएगा कि सरकारी फाइल और इंसानी पीड़ा के बीच कितना बड़ा अंतर होता है।क्योंकि सरकार के लिए एक फाइल कुछ पन्नों का पुलिंदा हो सकती है,लेकिन किसी आंदोलनकारी परिवार के लिए वही फाइल उसकी पूरी जिंदगी की लड़ाई हो सकती है।हम एहसान नहीं मांग रहे हैं माननीय जी,यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि राज्य आंदोलनकारी और उनके आश्रित सरकार से कोई व्यक्तिगत कृपा नहीं मांग रहे।वे यदि पात्र हैं, तो अपने अधिकार की मांग कर रहे हैं।और अधिकार किसी अधिकारी की व्यक्तिगत कृपा नहीं होता।कानून और शासनादेश का लाभ पात्र नागरिक को मिलना ही चाहिए।इसलिए इस मामले को दया, कृपा या राजनीतिक घोषणा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
इसे अधिकार और प्रशासनिक उत्तरदायित्व के रूप में देखा जाना चाहिए। मुख्यमंत्री जी, अब हम आपसे कुछ स्पष्ट कदम चाहते हैं
हमारी मांगें बिल्कुल स्पष्ट हैं
1. सेवारत राज्य आंदोलनकारियों के पात्र आश्रितों के आश्रित प्रमाण पत्र से संबंधित प्रकरणों का स्पष्ट और निष्पक्ष निस्तारण किया जाए।
2. जिलाधिकारी कार्यालयों में लंबित वंचित राज्य आंदोलनकारियों की सूची एवं प्रकरणों की समीक्षा कराई जाए।
3. प्रत्येक लंबित मामले की स्थिति सार्वजनिक/लिखित रूप से स्पष्ट की जाए।
4. पात्र मामलों के निस्तारण के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की जाए।
5. यदि किसी अधिकारी को शासनादेश/अधिनियम की व्याख्या को लेकर कोई भ्रम है तो शासन स्तर से तत्काल स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं।
6. जिन मामलों में देरी हुई है, उनके कारणों की प्रशासनिक समीक्षा की जाए, ताकि पात्र लोगों को अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा न करनी पड़े। मुख्यमंत्री जी, इतिहास आपको देख रहा है।आज सत्ता आपके हाथ में है।कल इतिहास इस दौर को देखेगा।इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितनी बैठकें हुईं।इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कितनी फाइलें चलीं।इतिहास यह पूछेगा कि “जब राज्य आंदोलनकारियों के परिवार अपने अधिकार के लिए दर-दर भटक रहे थे, तब सरकार ने क्या किया?”आज आपके पास अवसर है कि आप इस पीड़ा का अंत करें।फाइलों से धूल हटवाएं।लंबित मामलों की समीक्षा कराएं।
पात्र लोगों को उनका अधिकार दिलाएं।और यह संदेश दें कि
उत्तराखंड अपने आंदोलनकारियों को भूला नहीं है।अब चुप्पी नहीं चलेगी मुख्यमंत्री जी,हम संघर्ष से पीछे हटने की बात नहीं कर रहे।हम किसी से टकराव की भाषा नहीं बोल रहे।लेकिन अन्याय के सामने चुप रहना भी संभव नहीं है।
जब तक पात्र आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों को उनका अधिकार नहीं मिलता, तब तक यह सवाल उठता रहेगा।आज एक परिवार पूछ रहा है।कल दूसरा पूछेगा।फिर तीसरा पूछेगा।
और अंततः पूरा उत्तराखंड पूछेगा कि “जिस राज्य के लिए हमने इतना कुछ दिया, उस राज्य ने हमारे परिवारों को क्या दिया?”इस प्रश्न का उत्तर केवल भाषणों से नहीं मिलेगा।उत्तर मिलेगा—न्याय से।मुख्यमंत्री जी, अंतिम आग्रह नहीं—अंतिम उम्मीद हैआपसे अंतिम उम्मीद यही है कि इस विषय को सामान्य सरकारी पत्राचार का हिस्सा न बनने दें।इसे अपनी निगरानी में लें।लंबित प्रकरणों की समीक्षा कराएं।जिम्मेदारी तय करें।समय सीमा तय करें।और पात्र परिवारों को उनका अधिकार दिलाएं।क्योंकि—उत्तराखंड केवल पहाड़, नदियां और सीमाएं नहीं है।उत्तराखंड उन लोगों की भावनाओं का नाम है, जिन्होंने इसके लिए संघर्ष किया।उत्तराखंड उन माताओं की आंखों का नाम है, जिन्होंने अपने लाल खोए।उत्तराखंड उन बहनों की राखियों का नाम है, जिनके भाई आंदोलन में गए और वापस नहीं लौटे।उत्तराखंड उन आंदोलनकारियों के संघर्ष का नाम है, जिन्होंने अपना वर्तमान कुर्बान करके हमारा भविष्य बनाया।उनके परिवारों को न्याय देना सरकार पर एहसान नहींसरकार का दायित्व है।इसलिए मुख्यमंत्री जी—अब तारीख नहीं चाहिए।अब आश्वासन नहीं चाहिए।अब फाइलों में घूमता हुआ एक और आदेश नहीं चाहिए।अब चाहिए—स्पष्ट निर्णय।अब चाहिए—समयबद्ध न्याय।अब चाहिए—राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान की वास्तविक रक्षा।और शायद यही वह क्षण है जब हमें अपने शहीदों की तस्वीरों के सामने खड़े होकर स्वयं से पूछना चाहिए—“क्या हमने उनके बलिदान का सम्मान किया?”यदि उत्तर अधूरा है, तो उस अधूरे उत्तर को पूरा करने की जिम्मेदारी आज हमारे सामने है।
माननीय मुख्यमंत्री जी, उत्तराखंड की जनता आपकी ओर देख रही है।राज्य आंदोलनकारियों के परिवार आपकी ओर देख रहे हैं।और इतिहास भी आपकी ओर देख रहा है।अब निर्णय का समय है।अब न्याय का समय है।अब जागने का समय है।
“शहीदों की शहादत का सम्मान करो—आंदोलनकारियों को न्याय दो।”“तारीख नहीं, फैसला चाहिए।
आश्वासन नहीं, अधिकार चाहिए।”
*भूपेंद्र सिंह देव ताऊजी उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी*
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