रिपोर्ट: लक्ष्मण बिष्ट : चंपावत:बातों-बातों में:शक्तिपुर का शक्तिमान :जगदीश पाण्डेय
Laxman Singh Bisht
Tue, Aug 4, 2026
बातों-बातों में:शक्तिपुर का शक्तिमान :जगदीश पाण्डेय

श्रीहनुमान जी के पास अपार शक्ति थी, किंतु उन्हें स्वयं अपनी शक्ति का स्मरण नहीं था। जामवंत को उन्हें याद दिलाना पड़ा"का चुप साधि रहा बलवाना।" मनुष्य की स्थिति भी कुछ ऐसी ही होती है। हममें से अधिकांश लोग अपनी क्षमताओं को पहचान ही नहीं पाते। यदि हम अपनी शक्ति को पहचानकर उसका सही उपयोग करें, तो असंभव भी संभव हो सकता है। चम्पावत नगर के समीप एक गाँव है—शक्तिपुर। नाम के अनुरूप ही वहाँ रहते हैं जगदीश चन्द्र पाण्डेय, जो अपनी कर्मठता, सादगी, सौम्यता और बहुमुखी प्रतिभा के कारण सचमुच इस नाम को सार्थक करते हैं। एक वीर सैनिक के इकलौते पुत्र जगदीश उन लोगों में हैं जो किसी भी कार्य को पूरे मनोयोग और दक्षता से करते हैं।घर-गृहस्थी के सभी कार्यों के साथ-साथ बिजली, पानी और अन्य तकनीकी कार्यों से लेकर कृषि, उद्यानिकी, मधुमक्खी पालन, पशुपालन तथा भवन निर्माण तक—हर क्षेत्र में उनकी दक्षता, मेहनत और लगन स्पष्ट दिखाई देती है। उनके घर पहुँचते ही मन में अद्भुत शांति, संतोष और कुछ नया करने की प्रेरणा जाग उठती है। अब यह वहाँ आने वाले व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह उस प्रेरणा को अपने जीवन में उतार पाता है या नहीं।लगभग 55 नाली भूमि के स्वामी पाण्डेय जी ने अपनी जमीन के एक-एक कोने का सदुपयोग किया है। सचमुच ऐसा लगता है मानो उनकी धरती सोना उगल रही हो। उनके पास होल्स्टीन-फ्रीज़ियन (एचएफ), साहीवाल, सिंधी और जर्सी नस्ल की कुल आठ गाएँ हैं। वर्तमान में दो-तीन दुग्धारू गायों से प्रतिदिन लगभग 50 लीटर दूध प्राप्त हो रहा है। उन्हें देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका पालन-पोषण कितने स्नेह और समर्पण से किया जाता है।

गायों के लिए बनी सुदृढ़ और व्यवस्थित गौशाला भी उन्होंने स्वयं अपने हाथों से तैयार की है। उसे देखकर लगता है कि उन्होंने एक कुशल राजमिस्त्री को भी चुनौती दे दी है। घर के चारों ओर मधुमक्खियों के डिब्बों के भीतर से मधुर भिनभिनाहट सुनाई देती है। प्रत्येक बॉक्स से औसतन लगभग चार किलोग्राम उत्तम गुणवत्ता का शहद प्राप्त होता है। इन दिनों उनके पॉलीहाउसेज में खीरा, ककड़ी, करेला, फ्रेंचबीन, टमाटर और शिमला मिर्च की भरपूर खेती हो रही है। खुले खेतों में खुबानी, हिमालयी चेरी, कीवी, माल्टा, अखरोट और नाशपाती के वृक्ष लहलहा रहे हैं। वहीं सेब की रेड डिलीशियस, रेड लामा गाला, टेरेक्स गाला, जेरोमिन, किंग रॉट तथा ग्रैनी स्मिथ जैसी उन्नत किस्मों से लदी डालियाँ उनकी मेहनत की कहानी स्वयं कह रही हैं।आज जब उत्तराखण्ड में बड़ी संख्या में लोग खेती, बागवानी और पशुपालन से विमुख होकर पलायन को ही विकल्प मान रहे हैं, तब जगदीश पाण्डेय अपने कार्यों से यह सिद्ध कर रहे हैं कि यदि मनुष्य अपनी शक्ति को पहचान ले और उसका सही दिशा में उपयोग करे, तो सफलता स्वयं उसके द्वार पर दस्तक देती है।हम प्रायः संसाधनों की कमी, अवसरों के अभाव, समय की कमी तथा जंगली जानवरों से होने वाले नुकसान का हवाला देते हैं।

किंतु जगदीश पाण्डेय केवल एक सफल प्रगतिशील किसान ही नहीं, बल्कि इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि जब मनुष्य अपनी शक्ति को पहचान लेता है, तब सीमित संसाधन भी असीम संभावनाओं में बदल जाते हैं।यदि प्रत्येक गाँव में एक-एक ऐसे जगदीश पाण्डेय तैयार हो जाएँ, तो खेती फिर से सम्मान का विषय बनेगी, पहाड़ों से पलायन रुकेगा, खेत बंजर नहीं रहेंगे और गाँव आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। वास्तव में राष्ट्र निर्माण किसी बड़ी योजना से नहीं, बल्कि ऐसे ही कर्मयोगियों के हाथों होता है। श्रीहनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण जामवंत ने कराया था। आज आवश्यकता है कि हम भी अपने भीतर के जामवंत को जगाएँ और स्वयं से पूछें—क्या हमने अपनी शक्ति को पहचाना है?
■ भगवत प्रसाद पाण्डेय
(लेखक साहित्यकार और राजस्व विभाग के से.नि. अधिकारी हैं)