रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : भारत की क्रिकेट पिचें हमेशा कटघरे में, बाकी दुनिया को क्लीन चिट क्यों?-शशांक पाण्डेय*
Laxman Singh Bisht
Mon, Dec 29, 2025
भारत की क्रिकेट पिचें हमेशा कटघरे में, बाकी दुनिया को क्लीन चिट क्यों?-शशांक पाण्डेय*
एशेज़ सीरीज़ का बॉक्सिंग डे टेस्ट मैच जब महज़ दो दिनों में समाप्त हुआ तो दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमियों ने इसे एक असामान्य घटना के रूप में देखा, लेकिन इस पर जो प्रतिक्रिया आई, वह लगभग शांत और स्वीकार्य रही। न तो टेस्ट क्रिकेट के भविष्य पर कोई बड़ा शोकगीत लिखा गया, न ही पिच को लेकर वैश्विक बहस छिड़ी। यह वही बॉक्सिंग डे टेस्ट है, जिसे क्रिकेट की परंपरा, धैर्य और गरिमा का प्रतीक माना जाता है। मेलबर्न या ऑस्ट्रेलिया की धरती पर होने वाला यह मुकाबला अपने आप में एक उत्सव होता है, लेकिन जब यह उत्सव दो दिन में सिमट गया, तब भी इसे खेल की स्वाभाविक अनिश्चितता मान लिया गया।
अब जरा कल्पना कीजिए, अगर यही दृश्य भारत में होता। अगर दिल्ली, नागपुर, कोलकाता,इंदौर या अहमदाबाद में कोई टेस्ट मैच दो दिनों में खत्म हो जाता तो क्या माहौल होता। टीवी चैनलों पर चीखते पैनल, सोशल मीडिया पर ट्रेंड बनते हैशटैग, पिच की तस्वीरों को ज़ूम करके दिखाया जाता और उसे टेस्ट क्रिकेट का दुश्मन घोषित कर दिया जाता। क्यूरेटर की मंशा पर सवाल उठते, घरेलू परिस्थितियों का फायदा उठाने के आरोप लगते और यहां तक कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड की नीयत तक को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता।
यह फर्क प्रतिक्रिया के साथ दृष्टिकोण का है। ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में अगर तेज़ गेंदबाज़ों को मदद मिलती है, विकेट उछाल लेती है और बल्लेबाज़ जल्दी ढेर हो जाते हैं तो उसे “क्लासिक टेस्ट कंडीशन” कहा जाता है। वहां गेंद हवा में स्विंग करे या पिच से जानलेवा उछाल मिले, तो उसे खेल का रोमांच माना जाता है। लेकिन भारत में जब स्पिन गेंदबाज़ पिच से टर्न निकाल लेते हैं और बल्लेबाज़ संघर्ष करते हैं, तो वही हालात अचानक “खराब पिच” और “टेस्ट क्रिकेट के लिए खतरा” बन जाते हैं।
टेस्ट क्रिकेट का मूल सिद्धांत यह नहीं कहता कि हर मैच पांच दिन चले। टेस्ट क्रिकेट तो परिस्थितियों की परीक्षा है। कहीं तेज़ हवा, कहीं उछाल, कहीं नमी, तो कहीं धूप में तपती पिच और घूमती गेंद। खिलाड़ी का कौशल इसी में है कि वह इन सब से जूझे। अगर हर जगह एक जैसी पिच हो जाए, जहां न गेंद घूमे, न उछले और हर मैच ड्रॉ की ओर बढ़े, तो शायद टेस्ट क्रिकेट की आत्मा ही खो जाए।
इतिहास पर नज़र डालें तो कई महान टेस्ट मैच तीन या चार दिन में ही खत्म हो गए हैं। वहीं कई पांच दिन तक चलने वाले मुकाबले ऐसे भी रहे हैं, जिन्हें देखकर दर्शक ऊब गए। मैच की गुणवत्ता उसकी अवधि से नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा से तय होती है। बॉक्सिंग डे टेस्ट में भी दोनों टीमों को समान परिस्थितियां मिलीं, दोनों को उसी पिच पर खेलना पड़ा और नतीजा खेल के भीतर से ही निकला।भारत में क्रिकेट भावनाओं से जुड़ा है और शायद इसी वजह से आलोचना भी ज़्यादा तीखी होती है। लेकिन यह भावना जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचती है तो अक्सर दोहरे मानदंडों में उलझ जाती है। जब भारत में टेस्ट जल्दी खत्म होता है तो उसे “टेस्ट क्रिकेट की हत्या” कहा जाता है, लेकिन जब वही बात ऑस्ट्रेलिया या इंग्लैंड में होती है तो उसे खेल का स्वाभाविक हिस्सा मान लिया जाता है।
एशेज़ का यह बॉक्सिंग डे टेस्ट दरअसल हमें आईना दिखाता है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मैच दो दिन में क्यों खत्म हुआ, बल्कि यह होना चाहिए कि क्या दोनों टीमों के बीच बराबरी की चुनौती थी। अगर जवाब हां है, तो फिर आलोचना का शोर केवल स्थान बदलने से क्यों बदल जाता है।टेस्ट क्रिकेट को बचाने की बात अक्सर की जाती है, लेकिन उसे बचाया जाएगा स्वीकार्यता से, विविधता से और ईमानदार नजरिए से। क्रिकेट की खूबसूरती इसी में है कि वह हर देश में अलग रंग दिखाता है। कहीं गेंद उछलती है, कहीं घूमती है, और कहीं बल्लेबाज़ों की परीक्षा होती है। अगर हम इस विविधता को ही नकारने लगें, तो समस्या पिच में नहीं, हमारे नजरिए में होगी।शायद अब समय आ गया है कि हम मैच के दिनों की गिनती छोड़कर खेल की आत्मा पर बात करें। वरना अगली बार जब कोई टेस्ट कहीं और दो दिन में खत्म होगा, तो हम फिर चुप रहेंगे और जब वही बात अपने घर में होगी, तो हल्ला मच जाएगा। यही असली सवाल है, और यही सबसे बड़ी विडंबना भी।
(लेखक लोहाघाट निवासी एवं क्रिकेट प्रेमी है)