रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट:बातों-बातों में:निःशुल्क पाठ्य पुस्तकें और पुरानी किताब का दौर: पांडे
बातों-बातों में:निःशुल्क पाठ्य पुस्तकें और पुरानी किताब का दौर: पांडे

विद्यालयों में पहली अप्रैल से नया शैक्षिक सत्र शुरू हो गया है। बच्चों के नए बस्ते, चमचमाती किताबें, नई पोशाक और मासूम चेहरों पर उत्साह सब मिलकर एकदम त्योहार जैसा माहौल बना रहे हैं। एक दौर हमारी पढ़ाई के दिनों का भी था, जब शिक्षा सत्र पहली जुलाई से शुरू होता था। न कोई बैनर, न गुब्बारे, न “वेलकम सेरेमनी”—बस सादा सा दृश्य। अभिभावक बच्चे को स्कूल ले जाते, नाम लिखवाते और गुरुजी के हवाले कर चुपचाप खिसक आते। इसके बाद मासाब की रौबीली आवाज गूंजती—"ए नए लड़के, सीधे बैठ!”बस, इसी एक वाक्य में शिक्षा की पूरी भूमिका तय हो जाती थी—अनुशासन, डर और सम्मान। बच्चा जब तक उस विद्यालय में पढ़ता, तब तक ही नहीं बल्कि उसके बाद भी मासाब के प्रति आदर बनाये रखता। साथ ही एक हल्का-सा डर भी मन में बसा रहता। पढ़ाई के दिनों में अगर बाजार में भी मासाब दिख जाएं, झेंप होती। चाल अपने आप सीधी हो जाती थी। आज का दृश्य कुछ अलग है। निजी विद्यालयों में “प्रवेशोत्सव” की धूम है—जैसे किसी शादी का कार्यक्रम हो। रंग-बिरंगे स्वागत द्वार, मिठाइयाँ, टॉफियां और “हमारे स्कूल में आपका स्वागत है” वाला मधुर संगीत। लोग 'बातों-बातों में ' कहते हैं- "ये निजी स्कूल कम, शिक्षा की दुकान हैं। जहाँ ग्राहक (अभिभावक) को खुश रखना पहली प्राथमिकता बन गया है। उधर सरकारी विद्यालयों में भी प्रवेशोत्सव मनाए जा रहे हैं, लेकिन अभिभावकों और बच्चों का सरकारी स्कूल की तरफ़ मोह भंग हो रहा है। फिर भी वहाँ इन दिनों सबसे खास बात है—निःशुल्क पाठ्य पुस्तकों का वितरण। नेता, जनप्रतिनिधि और अधिकारी बच्चों के हाथों में किताबें थमा रहे हैं और अखबारों में बड़े-बड़े शीर्षक छप रहे हैं—

“पुस्तक वितरण का भव्य आयोजन!”
यह सब देखकर हमें अपना समय याद आ जाता है—जब किताबें केवल पढ़ने की चीज़ नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी और परंपरा हुआ करती थीं। साल के अंत में ही घर से हिदायत मिल जाती—"बच्चों! किताबें संभालकर रखना, फलाने को देनी हैं।” तब किताबों पर कवर चढ़ाना, नाम साफ-सुथरा लिखना, पन्ने न फटें इसका ध्यान रखना—यह सब सिर्फ अपनी पढ़ाई के लिए ही नहीं, बल्कि अगले बच्चे के लिए भी होता था। कई बच्चे तो पहले से ही अपने बरिष्ठ साथियों से बात कर लेते थे—"भइया, अपनी किताब हमें दे देना।” और जब वे किताबें मिलतीं, तो उनमें सिर्फ पाठ्यक्रम ही नहीं होता था—पिछले छात्र की पेंसिल से खींची गई लाइनें, किनारों पर लिखे छोटे-छोटे नोट्स, हल किए गए सवाल… जैसे एक अनुभव भी साथ आता था। इस तरह एक ही किताब कई बच्चों की पढ़ाई का आधार बनती थी। यह सिर्फ संसाधनों की कमी नहीं थी, बल्कि संसाधनों के सम्मान और साझा करने की संस्कृति थी। आज किताबें हर साल नई आती हैं, कवर भी नए होते हैं, लेकिन वह अपनापन, वह जुड़ाव और वह जिम्मेदारी कहीं खो गई है। अब न कोई पुरानी किताब लेना चाहता है, न देना—शायद इसलिए कि अब जरूरत से ज्यादा “प्रतिष्ठा” भी पढ़ाई के साथ जुड़ गई है। आज सब कुछ है—उत्सव, प्रचार और सुविधाएँ…। बस कभी-कभी लगता है,वह सादगी, वह साझेदारी और मासाब की "ए नए लड़के…” वाली गूंज कहीं पीछे छूट गई है।
■भगवत प्रसाद पाण्डेय
पाटन-पाटनी (लोहाघाट)