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रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट:मोबाइल गेमिंग की लत माता-पिता के लिए गंभीर चेतावनी-शशांक पाण्डेय

Laxman Singh Bisht

Fri, Feb 6, 2026

मोबाइल गेमिंग की लत माता-पिता के लिए गंभीर चेतावनी-शशांक पाण्डेय

गाजियाबाद की घटना बड़ी चेतावनी
भारत में ऑनलाइन गेमिंग अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसी सामाजिक चुनौती के रूप में उभर रही है, जो बच्चों और किशोरों के मानसिक, शैक्षिक और पारिवारिक जीवन को भीतर से प्रभावित कर रही है। तकनीक ने जहाँ ज्ञान और अवसरों के नए द्वार खोले हैं, वहीं बिना संतुलन और निगरानी के उसका उपयोग बच्चों को एक ऐसी आभासी दुनिया में खींच ले जा रहा है, जहाँ वास्तविक जीवन की संवेदनाएँ, रिश्ते और जिम्मेदारियाँ धीरे-धीरे धुंधली पड़ने लगती हैं। यह स्थिति केवल किसी एक वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी और ग्रामीण—दोनों ही समाजों में तेजी से फैल रही है।ऑनलाइन गेम्स की बनावट ही ऐसी होती है कि वे लगातार ध्यान खींचे रखें। जीत का त्वरित आनंद, स्तर बढ़ने का उत्साह और आभासी पहचान का आकर्षण बच्चों को घंटों स्क्रीन से जोड़े रखता है। शुरुआत में यह सब सहज और मज़ेदार लगता है, लेकिन समय के साथ यह आदत बन जाती है।

पढ़ाई का समय घटने लगता है, नींद प्रभावित होती है और बच्चे वास्तविक दुनिया की गतिविधियों से कटने लगते हैं। जब कोई बच्चा अपनी उम्र के अनुरूप सामाजिक अनुभवों से दूर होने लगता है, तो उसका भावनात्मक विकास भी बाधित होता है।मानसिक स्तर पर ऑनलाइन गेमिंग का प्रभाव और भी गहरा है। कई बच्चे जीत-हार को केवल गेम के पैमाने पर देखने लगते हैं, जिससे धैर्य और आत्म-नियंत्रण कमजोर पड़ता है। छोटी-छोटी असफलताएँ उन्हें असहनीय लगने लगती हैं। चिड़चिड़ापन, बेचैनी और अकेलापन बढ़ता है, पर इन संकेतों को अक्सर सामान्य समझकर टाल दिया जाता है। वास्तविक जीवन की चुनौतियों से सामना करने के बजाय बच्चा आभासी दुनिया में शरण लेने लगता है, जहाँ समस्याएँ एक बटन दबाने से बदल जाती हैं। यही भ्रम धीरे-धीरे मानसिक दबाव को बढ़ाता है।पारिवारिक परिवेश भी इस समस्या से अछूता नहीं है। आज के तेज़ रफ्तार जीवन में माता-पिता की व्यस्तता बढ़ी है और संवाद का समय घटा है। कई बार स्मार्टफोन बच्चों के हाथ में इसलिए थमा दिया जाता है ताकि वे शांत रहें, लेकिन यही चुप्पी आगे चलकर दूरी में बदल जाती है। जब बच्चे अपनी भावनाएँ साझा नहीं कर पाते, तो वे भीतर ही भीतर संघर्ष करते रहते हैं। परिवार अगर समय रहते संकेतों को न पहचाने, तो स्थिति और जटिल हो सकती है।शिक्षा व्यवस्था में भी यह चुनौती साफ दिखाई देती है। ऑनलाइन गेमिंग का असर पढ़ाई पर पड़ता है—ध्यान भटकता है, एकाग्रता कम होती है और लक्ष्य धुंधले पड़ जाते हैं। स्कूल केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहकर यदि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल व्यवहार पर खुलकर बात करें, तो बहुत सी समस्याओं को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता है। बच्चों को यह सिखाना ज़रूरी है कि तकनीक उनका साधन है, स्वामी नहीं।ऑनलाइन गेमिंग उद्योग की भूमिका पर भी गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। लाभ और लोकप्रियता की दौड़ में कई प्लेटफॉर्म्स बच्चों की उम्र और मानसिक स्थिति को नजरअंदाज कर देते हैं। आकर्षक प्रचार, आभासी पुरस्कार और निरंतर खेलने के लिए प्रेरित करने वाले तंत्र बच्चों को गहरे जाल में फँसा सकते हैं। यहाँ सरकार और नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे सख्त दिशानिर्देश बनाएं, आयु-सीमा का पालन कराएँ और बच्चों के हितों की रक्षा करें।समाज के स्तर पर भी हमें अपनी सोच बदलनी होगी। खेल केवल स्क्रीन तक सीमित न रहें, इसके लिए मैदान, पुस्तकें, कला और सामूहिक गतिविधियों को फिर से बच्चों के जीवन में जगह देनी होगी। जब बच्चे वास्तविक दुनिया में सफलता, मित्रता और आत्म-संतोष का अनुभव करते हैं, तो आभासी आकर्षण अपने आप कमजोर पड़ने लगता है। सकारात्मक माहौल और भरोसे का रिश्ता बच्चों को भीतर से मजबूत बनाता है।अंत में यह समझना जरूरी है कि ऑनलाइन गेमिंग स्वयं में बुराई नहीं है, समस्या उसका असंतुलित और अनियंत्रित उपयोग है। बच्चों को रोकने से अधिक ज़रूरी है उन्हें समझाना, साथ बैठकर समय बिताना और उनकी बात सुनना। समय रहते चेतना, संवाद और जिम्मेदार नीतियाँ ही इस बढ़ती समस्या का समाधान हैं। अगर आज हम सजग होकर कदम उठाएँ, तो तकनीक बच्चों के भविष्य के लिए खतरा नहीं, बल्कि अवसर बन सकती है। अन्यथा गाजियाबाद जैसी घटनाए सामने आती रहेंगी । जो अभिभावकों के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

(लेखक लोहाघाट निवासी शिक्षक एवं समसामयिक घटनाओं पर नियमित लिखते है)

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