रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट:वायरल होने की होड़ में गुम हो रही है इंसानियत—शशांक पाण्डेय
Laxman Singh Bisht
Thu, Jan 8, 2026
वायरल होने की होड़ में गुम हो रही है इंसानियत—शशांक पाण्डेय
आज का समाज एक अजीब दौर से गुजर रहा है, जहाँ संवेदना से पहले सूचना और इंसानियत से पहले इंटरनेट की मौजूदगी ज़्यादा मायने रखने लगी है। कहीं सड़क हादसा हो जाए, कोई व्यक्ति बेहोश होकर गिर जाए, या किसी के साथ अन्याय होता दिखे—तो आसपास खड़े लोगों की पहली प्रतिक्रिया मदद करना नहीं, बल्कि मोबाइल निकालकर वीडियो बनाना होती है। मानो यह तय हो चुका हो कि पहले रिकॉर्ड होगा, बाद में प्रतिक्रिया। यही वह बिंदु है जहाँ से मानवता धीरे-धीरे दम तोड़ती दिखाई देती है।एक समय था जब किसी अनजान की तकलीफ़ देखकर भी दिल बेचैन हो जाता था। लोग बिना परिचय के भी मदद के लिए आगे बढ़ते थे, क्योंकि इंसान होने का यही स्वभाव था। आज वही दृश्य बदल चुका है। भीड़ बढ़ती है, लेकिन सहारा देने वाला कोई नहीं मिलता। हर हाथ में मोबाइल है, हर आँख स्क्रीन में कैद है और हर दिमाग में यही सवाल—“यह वीडियो कितने लाइक पाएगा?”तकनीक ने हमें ताक़त दी है, लेकिन विवेक छीन लिया है। कैमरा ऑन करते ही इंसान का ज़मीर ऑफ़ हो जाता है। कोई नहीं सोचता कि सामने जो तड़प रहा है, वह भी किसी का बेटा, बेटी, पिता या माँ है। उसके लिए यह कोई ‘घटना’ नहीं, बल्कि जीवन का सबसे कठिन पल हो सकता है। मगर हम उस पल को समझने के बजाय उसे कैद करने में लगे रहते हैं।
सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया है। वायरल होने की होड़ में संवेदनशीलता मज़ाक बनती जा रही है। दुर्घटनाओं के वीडियो, रोते-बिलखते चेहरों की तस्वीरें, निजी दुखों के क्लिप—सब कुछ खुलेआम साझा किया जा रहा है, बिना यह सोचे कि इससे किसी के मन पर क्या असर पड़ेगा। इंसान की पीड़ा अब “कंटेंट” कहलाने लगी है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस व्यवहार को गलत मानने वाले भी चुप हैं। जो मदद करना चाहता है, वह भीड़ से अलग खड़ा होकर डरता है—कहीं कोई सवाल न उठा दे, कहीं कोई वीडियो उसे ही कटघरे में न खड़ा कर दे। इस डर ने समाज को भीतर से खोखला कर दिया है। समझदारी अब नैतिकता से नहीं, बल्कि ट्रेंड से तय होने लगी है।
आज सवाल यह नहीं है कि मोबाइल रखना गलत है या नहीं, सवाल यह है कि हम इंसान रह पाए हैं या नहीं। तकनीक का उद्देश्य जीवन को आसान बनाना था, संवेदना को खत्म करना नहीं। अगर किसी की मदद करने से पहले हम कैमरा ऑन करते हैं, तो हमें खुद से पूछना चाहिए—क्या हमने सच में तरक्की की है?अब भी समय है। मोबाइल नीचे रखकर हाथ बढ़ाने का साहस ज़िंदा है। इंसानियत पूरी तरह मरी नहीं है, बस दब गई है। ज़रूरत है उसे फिर से जगाने की। क्योंकि अगर हमने आज समझ और संवेदना को नहीं बचाया, तो आने वाला समय हमें एक ऐसे समाज के रूप में याद करेगा जहाँ सब कुछ रिकॉर्ड हुआ, लेकिन किसी का दर्द समझा नहीं गया।
(लेखक लोहाघाट ज़िला चम्पावत निवासी हैं एवं समसामहिक मुद्दों पर नियमित लिखते है)