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रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट:धरती को बचाना है तो प्रकृति के साथ संतुलन बनाना होगा:शशांक पाण्डे

Laxman Singh Bisht

Fri, Jun 5, 2026

धरती को बचाना है तो प्रकृति के साथ संतुलन बनाना होगा:शशांक पाण्डे

प्रकृति और मानव का संबंध उतना ही पुराना है जितना स्वयं मानव सभ्यता का इतिहास। मानव जीवन की प्रत्येक आवश्यकता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रकृति पर निर्भर करती है। शुद्ध वायु हमें जीवन देती है, जल हमारी प्यास बुझाता है, भूमि हमें अन्न प्रदान करती है और वन हमें अनेक प्रकार के संसाधन उपलब्ध कराते हैं। इन सभी तत्वों का सम्मिलित स्वरूप ही पर्यावरण कहलाता है। पर्यावरण हमारे चारों ओर दिखाई देने वाले पेड़-पौधों, नदियों, पहाड़ों और जीव-जंतुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा जटिल तंत्र है जो पृथ्वी पर जीवन को संतुलित और सुरक्षित बनाए रखता है। पर्यावरण के बिना जीवन की कल्पना भी असंभव है। यही कारण है कि पर्यावरण संरक्षण आज पूरे विश्व की सबसे बड़ी आवश्यकताओं में से एक बन गया है।मानव ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। आधुनिक विकास ने जीवन को सुविधाजनक और सरल बनाया है, लेकिन इस विकास की कीमत प्रकृति को चुकानी पड़ रही है। बढ़ती जनसंख्या, तेजी से हो रहा शहरीकरण, औद्योगीकरण, वनों की अंधाधुंध कटाई, खनन गतिविधियाँ, वाहनों की बढ़ती संख्या तथा प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन पर्यावरण के लिए गंभीर संकट उत्पन्न कर रहे हैं। मानव की असीमित इच्छाओं और भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ ने प्रकृति के संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है। आज पृथ्वी जिस पर्यावरणीय संकट का सामना कर रही है, वह काफी हद तक मानव की अविवेकपूर्ण गतिविधियों का परिणाम है।इन्हीं चिंताओं को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्वभर में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में आयोजित मानव पर्यावरण सम्मेलन के बाद हुई थी। वर्ष 1974 से यह दिवस वैश्विक स्तर पर मनाया जाने लगा। इस अवसर पर विभिन्न देशों में वृक्षारोपण अभियान, स्वच्छता कार्यक्रम, पर्यावरण रैलियाँ, संगोष्ठियाँ, प्रदर्शनी, निबंध एवं भाषण प्रतियोगिताएँ तथा जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।वर्तमान समय में पर्यावरण प्रदूषण एक वैश्विक समस्या बन चुका है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण मानव स्वास्थ्य तथा प्राकृतिक संतुलन के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। कारखानों और वाहनों से निकलने वाला धुआँ वायुमंडल को प्रदूषित कर रहा है। नदियों और जल स्रोतों में औद्योगिक कचरा तथा प्लास्टिक फेंके जाने से जल प्रदूषण बढ़ रहा है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से भूमि की उर्वरता प्रभावित हो रही है। शहरी क्षेत्रों में बढ़ता शोर ध्वनि प्रदूषण को जन्म दे रहा है।

इन सभी समस्याओं का प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन, पशु-पक्षियों तथा संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा है।जलवायु परिवर्तन आज विश्व के सामने सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौती के रूप में उभरा है। पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिसे वैश्विक तापन या ग्लोबल वार्मिंग कहा जाता है। इसके कारण हिमालय और ध्रुवीय क्षेत्रों की बर्फ तेजी से पिघल रही है। समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और अनेक तटीय क्षेत्रों पर खतरा मंडरा रहा है। मौसम चक्र में असामान्य परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। कहीं अत्यधिक वर्षा हो रही है तो कहीं भीषण सूखा पड़ रहा है। बाढ़, चक्रवात, जंगलों में आग तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। यदि समय रहते इन समस्याओं पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो भविष्य में इनके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं।वन पर्यावरण के संतुलन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन प्रदान करते हैं तथा जलवायु को संतुलित बनाए रखते हैं। वे मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, वर्षा चक्र को प्रभावित करते हैं तथा अनेक जीव-जंतुओं को आश्रय प्रदान करते हैं। दुर्भाग्यवश विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों की कटाई की जा रही है। इससे जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और अनेक दुर्लभ प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर पहुँच रही हैं। इसलिए वृक्षारोपण और वन संरक्षण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गए हैं।प्लास्टिक प्रदूषण भी आधुनिक युग की एक गंभीर समस्या है। प्लास्टिक आसानी से नष्ट नहीं होता और वर्षों तक पर्यावरण में बना रहता है। यह भूमि, जल और समुद्री जीवों के लिए अत्यंत हानिकारक है। आज नदियों, झीलों, समुद्रों और यहाँ तक कि पहाड़ों पर भी प्लास्टिक कचरे का अंबार दिखाई देता है। इसके दुष्प्रभावों को देखते हुए हमें एकल उपयोग वाले प्लास्टिक का प्रयोग कम करना चाहिए तथा पर्यावरण अनुकूल विकल्पों को अपनाना चाहिए।पर्यावरण संरक्षण के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। प्रत्येक नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। हमें अपने दैनिक जीवन में ऐसे व्यवहार अपनाने होंगे जो पर्यावरण के अनुकूल हों। जल और बिजली की बचत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, प्लास्टिक का कम प्रयोग, कचरे का उचित प्रबंधन, वृक्षारोपण तथा स्वच्छता जैसे छोटे-छोटे कदम भी बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति पर्यावरण के प्रति जागरूक हो जाए, तो पृथ्वी को बचाने का अभियान कहीं अधिक प्रभावी हो सकता है।विद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों की भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका है। बच्चों में प्रारंभ से ही पर्यावरण संरक्षण की भावना विकसित की जानी चाहिए। जब नई पीढ़ी प्रकृति के महत्व को समझेगी, तभी भविष्य में पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी समाज का निर्माण संभव होगा।आज का यह दिन हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हमने प्रकृति से कितना लिया है और बदले में उसे क्या लौटाया है। यदि हम आज भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियों को एक प्रदूषित और असुरक्षित पृथ्वी विरासत में मिलेगी। इसलिए समय की मांग है कि हम पर्यावरण संरक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएं और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए विकास की राह पर आगे बढ़ें।अंततः यही कहा जा सकता है कि पर्यावरण की रक्षा ही मानवता की रक्षा है। स्वच्छ पर्यावरण ही स्वस्थ जीवन का आधार है। विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह प्रेरणा देता है कि हम पृथ्वी को हरा-भरा, स्वच्छ, सुंदर और सुरक्षित बनाने के लिए मिलकर कार्य करें। जब प्रत्येक व्यक्ति पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेगा, तभी एक स्वस्थ, संतुलित और समृद्ध विश्व का निर्माण संभव होगा।(लेखक सामाजिक विज्ञान के शिक्षक हैं)

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