रिपोर्ट:जगदीश जोशी 👹👹 : लोहाघाट:पुरानी पेंशन बहाली मोर्चा ने तिलाड़ी के शहीदों को किया याद पुरानी पेंशन बहाली की उठाई मांग ।
Laxman Singh Bisht
Fri, May 30, 2025
अग्नि वीरों को स्थाई नियुक्त देने की उठाई मांग।
उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में 30 मई 1930 को राजशाही की क्रूरता की भेंट चढ़े तिलाड़ी के सैकड़ो शहीदों को आज याद किया जा रहा है ।लोहाघाट के वीर कालू सिंह चौराहे में पुरानी पेंशन बहाली मोर्चा जिला अध्यक्ष गोविंद सिंह मेहता की अध्यक्षता मंत्री प्रकाश तड़ागी के संचालन में एकत्र हुए शिक्षकों व कर्मचारियों ने वीर कालू सिंह मेहरा चौक में तिलाड़ी के शहीदों के साथ-साथ उत्तराखंड के शहीदों को याद किया तथा 1857 के क्रांति के नायक वीर कालू सिंह माहरा की मूर्ति में माल्यार्पण कर पुष्प अर्पित किए। पुरानी पेंशन बहाली मोर्चा जिला अध्यक्ष गोविंद सिंह मेहता ने कहा शहीदों का संघर्ष हमें संघर्ष करने के लिए प्रेरित करता है ।
कहा शिक्षक व कर्मचारी लंबे समय से सरकार से शिक्षकों ,कर्मचारियों व अर्ध सैनिक बलों की पुरानी पेंशन वाली की मांग कर रहे हैं पर सरकार है सुनने को तैयार नहीं है ।मेहता ने चेतावनी देते हुए कहा जब तक उनकी मांगे नहीं मानी जाएगी पुरानी पेंशन बहाली आंदोलन जारी रहेगा। इस दौरान सभी शिक्षकों व कर्मचारियों ने जोरदार नारेबाजी करते हुए पुरानी पेंशन बहाली की मांग की। कहा उत्तराखंड के युवाओं एक रोजगार होता था भारतीय सेना उसे भी सरकार ने छीन लिया और स्थाई सैनिकों के बदले अग्नि वीर योजना शुरू कर दी जो उत्तराखंड के युवाओं के साथ छल है। पुरानी पेंशन बहाली मोर्चा ने अग्नि वीर युवाओं को स्थाई नियुक्ति देने की भी मांग की। कहा सरकार अर्धसैनिक बलों व कर्मचारियों का पैसा हड़पने की जो साजिश रच रही है उसे किसी भी कीमत में कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। कर्मचारी संगठनो ने सरकार से अपील करते हुए कहा कि वह संवेदनशीलता के साथ इस विषय पर विचार करें और कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करें।
मालूम हो 30 मई 1930 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी के बड़कोट में किसानों के द्वारा जल जंगल व जमीन को लेकर जो आंदोलन किया जा रहा था उसे दबाने के लिए टिहरी के राजा के द्वारा अपने सैनिकों को आंदोलन को कुचलने के आदेश दिए। जिस पर राजा के सैनिकों ने जलियांवाला बाग कांड की तरह सैकड़ो निहत्थे किसानों पर गोलियां बरसा दी जिस कारण दो ढाई सौ किसान मौके पर शहीद हो गए तथा सैकड़ो किसान यमुना नदी में कूद गए जिस कारण वह भी शहीद हो गए थे। इन शहीद हुए किसानों को श्रद्धांजलि देने 30 में 1949 से तिलाड़ी शहीद दिवस मनाया जाता है।इस दौरान प्राथमिक शिक्षक संघ जिला अध्यक्ष गोविंद बोरा ,रा0शिक्षक संघ अध्यक्ष जगदीश अधिकारी ,प्रकाश उपाध्याय ,जीवन ओली ,नरेश जोशी, नवीन पांडे, कुंवर प्रथोली ,मयंक पुनेठा,संजय कुमार ,नवीन बिष्ट,रितेश वर्मा, पंचदेव पांडे ,सुनील पांडे, शिवनाथ ,गंगेश तिवारी ,नारायण दत्त, आरेंद्र गंगवार ,दिवाकर बुधीयाल ,बलवंत बिष्ट ,विनोद धोनी ,ओम प्रकाश भट्ट ,चंद्रकांत खर्कवाल ,संजय कुमार, मिंटू राणा ,विनोद गिरि ,नवीन जोशी ,राजू शंकर जोशी आदि उपस्थित रहे।
तिलाड़ी शहीद दिवस उत्तराखंड के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और भावनात्मक दिन है, जो हर वर्ष 30 मई को मनाया जाता है। यह दिन 1930 में टिहरी रियासत के तिलाड़ी मैदान में घटित एक दुखद घटना की याद में मनाया जाता है, जिसे 'तिलाड़ी कांड' के नाम से जाना जाता है।
तिलाड़ी कांड: पृष्ठभूमि और घटना
1930 में, टिहरी रियासत के राजा नरेंद्र शाह ने जंगलों, जल और जमीन पर जनता के पारंपरिक अधिकारों को समाप्त करने के लिए कठोर नीतियाँ लागू कीं। इन नीतियों के विरोध में, रंवाई और जौनपुर क्षेत्र के सैकड़ों किसान तिलाड़ी मैदान में एक महापंचायत के लिए एकत्र हुए। राजा की सेना ने इन निहत्थे लोगों को तीन दिशाओं से घेर लिया, जबकि चौथी दिशा में यमुना नदी बह रही थी। बिना किसी चेतावनी के, सेना ने गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं, जिससे कई लोग मारे गए और कई अन्य जान बचाने के लिए नदी में कूद गए, लेकिन तेज धाराओं में बह गए ।
शहीद दिवस का आयोजन
1949 से, हर वर्ष 30 मई को उत्तरकाशी जिले की बड़कोट तहसील के तिलाड़ी में शहीद दिवस मनाया जाता है। इस दिन शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है, और 'तिलाड़ी सम्मान' जैसे पुरस्कारों के माध्यम से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित किया जाता है ।
समकालीन प्रासंगिकता
तिलाड़ी कांड केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि यह आज भी जल, जंगल और जमीन पर जनता के अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक है। आज भी, जब प्राकृतिक संसाधनों पर निजीकरण और बाहरी हस्तक्षेप की नीतियाँ लागू की जा रही हैं, तिलाड़ी के शहीदों का बलिदान हमें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देता है ।
साहित्यिक अभिव्यक्ति
तिलाड़ी कांड पर आधारित विद्यासागर नौटियाल का उपन्यास "यमुना के बागी बेटे" इस घटना का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है, जो राजशाही के दमन और जनता के प्रतिरोध की गाथा को उजागर करता है ।तिलाड़ी शहीद दिवस न केवल उत्तराखंड के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाता है कि अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर संघर्ष करना कितना आवश्यक है।