रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट 👹👹 : 72 घंटे भूखे प्यासे रहकर 300 चीनियों को ढेर कर वीरगति पाने वाले राइफलमैन जसवंत सिंह
Laxman Singh Bisht
Thu, May 29, 2025
चीनी सेना ने भी माना उनका लोहा। सेला और नूरा दो बहनों ने की थी जसवंत सिंह की मदद। जसवंत से प्यार करती थी सैला।
मोहब्बत के साथ-साथ खूनी जंग की कहानी। 72 घंटे अकेले लड़ता रहा जांबाज योद्धा।
भारत चीन 1962 की जंग के नायक राइफलमैन जसवंत सिंह रावत का जन्म 19 अगस्त 1941 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में एक साधारण परिवार में हुआ था। सेना में जाने का जुनून जसवंत सिंह में बचपन से भरा पड़ा था। उम्र बढ़ने के साथ जुनून भी बढ़ता रहा जसवंत सिंह गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हो गए। सेना में शामिल होने के कुछ ही दिन बाद 1962 की भारत और चीन के बीच जंग शुरू हो गई थी। इस जंग में अरुणाचल में नूरानांग की लड़ाई के दौरान उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया। जसवंत सिंह रावत ने 72 घंटे भूखे प्यासे रहकर अकेले ही चीन के 300 से ज्यादा सैनिकों को मौत की नींद सुला दिया था पर अंत में गोला बारूद खत्म होने की वजह से चीनी सैनिकों ने जसवंत सिंह को घेर लिया। जब चीनी कमांडर ने देखा एक अकेले सिपाही ने उन्हें 72 घंटे रोककर उनके 300 से ज्यादा सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया तो उसे राइफलमैन जसवंत सिंह पर काफी गुस्सा आया और चीनी कमांडर उनके सर को काटकर चीन ले गया। लेकिन वह जसवंत सिंह की वीरता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने जसवंत सिंह की प्रतिमा बनाकर भारतीय सैनिकों को भेंट की।
जसवंत सिंह रावत को इस वीरता के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। वर्ष 2019 में जसवंत की इस वीरता प हिंदी फिल्म '72 ऑवर्स: शहीद हू नेवर डाइड' बनी ।1962 की जंग में भारतीय सेना की एक पोस्ट आज इसे राइफलमैन जसवंत सिंह रावत के नाम पर जसवंतगढ़ के नाम से जाना जाता है।यहां शहीद राइफलमैन जसवंत सिंह रावत के कपड़े हर रोज प्रेस होते हैं, उनके जूते हर रोज पॉलिश होते हैं। उन्हें नाश्ता, लंच सबकुछ सर्व होता है। इस जांबाज योद्धा को शहादत के बाद भगवान का दर्जा देकर मंदिर भी बनाया गया है। इस मंदिर पर सेना का हर आने जाने वाला अधिकारी व जवान उन्हें प्रणाम करता है।इस सैनिक का नाम है जसवंत सिंह रावत 19 अगस्त 1941 को जन्मे जसवंत ने 1962 की लड़ाई में चीनियों के दांत खट्टे कर दिए थे। राइफलमैन जसवंत सिंह जिन्हें शहादत के बाद सेना में प्रमोशन देकर कैप्टन बना दिया गया । नवंबर 1962 में भारत-चीन जंग में हजारों चीनी सैनिक भारत में घुसते चले जा रहे थे।17 नवंबर को चीनी फौज ने सेला पास की और से हमला किया। इस बार वे अपने साथ एमएमजी लेकर आए थे। जिसकी वजह से चीनियों की आक्रमण क्षमता बढ़ गई थी। अब वे एक किलोमीटर दूर से ही भारतीय सैनिकों को निशाना बना सकते थे। चीनी फौज एमएमजी के साथ साथ मोर्टार फायरिंग भी कर रही थी। ये गन अगर लगातार फायर करती रहती इसकी आड़ में चीनी सैनिक काफी अंदर तक घुसकर भारतीय चौकियों में भारी नुकसान पहुंचा सकते थे। पर मोर्चे पर जसवंत सिंह, त्रिलोक सिंह और गोपाल सिंह डट गए ।इस कड़ी परिस्थिति में गढ़वाल राइफल्स के तीनों बहादुर जवानों ने निश्चय लिया कि दुश्मन की एमएमजी को खामोश किया जाए राइफलमैन जसवंत सिंह, त्रिलोक सिंह और गोपाल सिंह ने बिना वक्त गंवाए अपने मिशन पर निकल पड़े। दुश्मन ऊंचाईं पर थे और सामने की गतिविधि को देख सकते थे। दुश्मन की मजबूत स्थिति का तीन बहादुरों के हौसले पर असर नहीं पड़ा।गोलियों की बौछार के बीच जसवंत सिंह और गोपाल आगे बढ़ने लगे, त्रिलोक सिंह का काम था, दुश्मन का ध्यान बांटना।दोनों ने मशीन गन पर कुछ ही दूरी से ग्रेनेड फेंका और चीनी टुकड़ी को वहीं धराशायी कर दिया।हालांकि, गोपाल और त्रिलोक इस लड़ाई में शहीद हो गए और जसवंत सिंह रावत गंभीर रूप से घायल हो गए।
नूरानांग पुल के लिए हुई थी यह भीषण लड़ाई ।जंग के बीच अरुणाचल प्रदेश का नूरानांग नई युद्धभूमि बनता जा रहा था। नूरानांग का मोर्चा संभालने की जिम्मेदारी 4 गढ़वाल राइफल्स को दी गई थी. इसी बटालियन की एक कंपनी नूरनांग पुल की रक्षा के लिए तैनात थी।चीनियों के लिए इस पुल पर कब्जा करना जरूरी थी. इसके बिना वे अरुणाचल में आगे नहीं बढ़ सकते थे।नूरानांग के पुल पर चीनी कब्जा नहीं कर पा रहे थे, उनकी हताशा बढ़ती जा रही थी, वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि कम हथियारों वाली भारतीय फौज आखिर इतना कड़ा मुकाबला कैसे कर रही है।चीन के हमले के बीच नूरानांग में तैनात जवानों को पीछे हटने का हुक्म सुनाया गया था लेकिन जसवंत सिंह पोस्ट छोड़कर नहीं हटे। सैंकड़ों चीनियों को रोकने के लिए उन्होंने अद्भुत प्लान बनाया। नूरा और सेला की मदद से ऊंचाई वाली जगह पर बंदूके तैनात की और वहां से इस तरह फायरिंग शुरू की कि दुश्मन अंदाजा न लगा पाए कि ऊपर कितने भारतीय मौजूद हैं।इस काम में जसवंत का साथ नूरा और सेला ने दिया जो दोनों बहने थी ।सेला जसवंत सिंह से प्यार करती थी।दोनों जसवंत के साथ डटी रहीं और अंत में वीरगति को प्राप्त हुई।चीनी सैनिकों को जबर्दस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। चीनी सेना ने तीन बार हमला किया और उन्हें शिकस्त मिली। इस हमले में 300 से ज्यादा चीनी सैनिक मारे गए थे।72 घंटे तक वो सच जान नहीं सके। चौथे हमले से पहले चीनी कमांडर को कुछ शक हुआ उसने उस शख्स को पकड़ा जो जसवंत को राशन की सप्लाई कर रहा था। भारी टॉर्चर के बाद उसने असलियत बता दी। चीनी सैनिक असलियत जान चुके थे। इसके बाद चीनियों ने घात लगाकर पहले जसवंत की मदद कर रही नूरा और शैला पर हमला किया, दोनों शहीद हो गईं।फिर जसवंत को उन्होंने चारों ओर से घेर लिया।चीनी सैनिकों को जब ये बता चला कि उनके साथ 3 दिन से अकेले जसवंत सिंह लड़ रहे थे तो वे हैरान रह गए. चीनी सैनिक उनका सिर काटकर ले गए। जल्द ही जंग में युद्धविराम की घोषणा हुई।इसके बाद चीनी कमांडर ने जसवंत की बहादुरी का लोहा माना।जसवंत और उनके कमांडिंग अफसर दोनों को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।इस लड़ाई के लिए 4 गढ़वाल राइफल्स को नूरानांग युद्ध सम्मान दिया गया।इस जंग के बाद जसवंत सिंह, जसवंत बाबा बन गए।नूरानांग में जसवंत सिंह का स्मारक है।जिस पोस्ट से जसवंत सिंह ने मोर्चा संभाला था। उसे मंदिर में बदल दिया गया है. इस स्मारक में उनका बिस्तर, कपड़े और जूते हैं. 4 जवानों को खासतौर पर उनकी सेवा में लगाया गया है. कहा जाता है कि जसवंत सिंह आज भी सरहद की रखवाली करते हैं। उनके जूते पॉलिश करने वालों का कहना है कि कई बार जूते कीचड़ में सने मिलते हैं। कई बार बिस्तर की चादर पर सिलवटें होती हैं, जैसे रात को कोई उसपर सोया हो।जसवंतगढ़ से गुजरने वाले सिपाही से लेकर जनरल तक स्मारक को सैल्यूट किए बिना आगे नहीं बढ़ते हैं।सेना उन्हें कई प्रमोशन दे चुकी है, यहां की खूबी ये है कि हर आने जाने वाले को सेना की ओर से चाय दी जाती है. यहां पर कुछ बंकर आज भी सेना द्वारा संजोकर रखे हुए हैं. इनमें आज भी साल 1962 युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए फोन, बर्तन, रसोई, चूल्हा, हैलमेट वॉर सब संजोकर रखा हुआ है। पूरे देश को इस योद्धा पर गर्व है। वही सैला और नूरा के नाम से सेला टनल व नूरा बाईपास का निर्माण किया गया है। दोनों बहनों ने बड़ी बहादुरी से जसवंत का साथ दिया था अन्यथा जसवंत इतनी देर चीनी सैनिकों को नहीं रोक पाते ।हमें गर्व है भारत की इन दो बहादुर बेटियों पर भी।