रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : लोहाघाट:कुमाऊँ की संस्कृति का अनमोल प्रतीक है भीटोले का महीना :शशांक पाण्डे
Laxman Singh Bisht
Sun, Mar 29, 2026
कुमाऊँ की संस्कृति का अनमोल प्रतीक है भीटोले का महीना :शशांक पाण्डे

उत्तराखण्ड के कुमाऊँ अंचल की सांस्कृतिक परंपराएँ अपनी सरलता, आत्मीयता और गहरे मानवीय संबंधों के कारण विशेष पहचान रखती हैं। इन्हीं परंपराओं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भावनात्मक परंपरा है—“भीटोला”। यह एक रस्म और प्रथा के साथ ही रिश्तों की मिठास, अपनापन और पारिवारिक जुड़ाव का जीवंत प्रतीक है। समय के साथ बहुत सी परंपराएँ बदल गईं या कम होती चली गईं, लेकिन भीटोले की भावना आज भी लोगों के दिलों में उतनी ही मजबूत बनी हुई है।
भीटोला मुख्यतः कुमाऊँ क्षेत्र में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक रिवाज है, जो विशेष रूप से चैत्र महीने में देखने को मिलता है। जब वसंत ऋतु अपने पूरे सौंदर्य के साथ धरती पर बिखरती है, पेड़-पौधों में नई कोंपलें फूटती हैं और वातावरण में एक नई ऊर्जा का संचार होता है, उसी समय यह परंपरा भी घर-घर में जीवित हो उठती है। भीटोला का संबंध विशेष रूप से बेटियों और बहनों से होता है, जो विवाह के बाद अपने ससुराल में रहती हैं। उनके मायके से उनके लिए उपहार और स्नेह भरा संदेश भेजा जाता है, जिसे ही भीटोला कहा जाता है।

भीटोले के अंतर्गत मायके से बेटी के लिए विभिन्न प्रकार के पकवान, फल, मिठाइयाँ, वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुएँ भेजी जाती हैं। इसमें सबसे खास होते हैं घर में बने पारंपरिक पकवान जैसे पुरी, पुए, गुजिया, सिंगल और खजूरे।इन पकवानो में मायके का प्रेम, माँ के हाथों का स्वाद और परिवार की भावनाएँ समाहित होती हैं। जब यह भीटोला ससुराल में पहुँचता है, तो बेटी के चेहरे पर जो खुशी और अपनापन झलकता है, वही इस परंपरा की असली पहचान है।भीटोले का सामाजिक और भावनात्मक महत्व अत्यंत गहरा है। यह परंपरा यह संदेश देती है कि विवाह के बाद भी बेटी अपने मायके से उतनी ही जुड़ी रहती है, जितनी पहले थी। यह उसके प्रति माता-पिता और भाई-बहनों के अटूट प्रेम को दर्शाता है। यह एक औपचारिकता नहीं, बल्कि रिश्तों को जीवित रखने और उन्हें समय-समय पर ताजा करने का माध्यम है। आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी यह परंपरा लोगों को अपने मूल और परिवार से जोड़े रखने का कार्य करती है।भीटोले की एक और विशेषता यह है कि यह सामूहिकता और सामाजिक जुड़ाव को भी बढ़ावा देता है। जब भीटोला किसी घर में पहुँचता है, तो वहाँ के लोग उसे आसपास के रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ भी साझा करते हैं। इससे आपसी प्रेम और भाईचारा बढ़ता है। गाँवों में यह एक उत्सव की तरह होता है, जहाँ लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर इस खुशी को साझा करते हैं। इस प्रकार, भीटोला एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज में स्नेह और सद्भाव का वातावरण बनाता है।समय के साथ-साथ भीटोले के स्वरूप में कुछ बदलाव भी देखने को मिले हैं। पहले जहाँ यह पूरी तरह पारंपरिक और घरेलू चीजों तक सीमित था, वहीं अब इसमें बाजार से खरीदी गई वस्तुएँ भी शामिल हो गई हैं। आजकल लोग कपड़े, मिठाइयाँ और अन्य उपहार बाजार से खरीदकर भेजते हैं। हालांकि, इन बदलावों के बावजूद भीटोले की मूल भावना में कोई कमी नहीं आई है। आज भी यह परंपरा उतनी ही प्रेम और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है, जितनी पहले निभाई जाती थी।

शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव के कारण कुछ स्थानों पर यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी यह पूरी गर्मजोशी के साथ जीवित है। अब कई लोग डिजिटल माध्यमों के जरिए भी अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हैं, लेकिन भीटोले का वास्तविक आनंद तभी आता है जब यह पारंपरिक रूप में घर-घर पहुँचता है। यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि चाहे समय कितना भी बदल जाए, रिश्तों की मिठास और अपनापन बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण होता है।भीटोला एक सांस्कृतिक परंपरा के साथ ही एक भावनात्मक धरोहर है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। यह हमें अपने परिवार, अपने रिश्तों और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। यह परंपरा हमें यह भी सिखाती है कि छोटी-छोटी चीजों में भी कितना बड़ा सुख और संतोष छिपा होता है। एक साधारण सा भीटोला, जिसमें कुछ पकवान और उपहार होते हैं, वह भी किसी के लिए अपार खुशी का कारण बन सकता है।अंततः कहा जा सकता है कि भीटोला कुमाऊँ की सांस्कृतिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा है। यह परंपरा हमें प्रेम, सम्मान और अपनत्व का महत्व समझाती है। आज के दौर में, जब लोग अपनी व्यस्त जिंदगी में रिश्तों के लिए समय नहीं निकाल पाते, ऐसे में भीटोला जैसी परंपराएँ हमें याद दिलाती हैं कि असली खुशी अपने लोगों के साथ जुड़ाव में ही है। इसलिए, इस परंपरा को न केवल संजोकर रखना चाहिए, बल्कि इसे आने वाली पीढ़ियों तक भी पहुँचाना चाहिए, ताकि वे भी इस अनमोल विरासत का अनुभव कर सकें और इसे आगे बढ़ा सकें।
(लेखक लोहाघाट ज़िला चम्पावत निवासी हैं)