रिपोर्ट:लक्ष्मण बिष्ट : खटीमा गोलीकांड की शहादत को उत्तराखंड कभी नहीं भूल सकता—शशांक पांडे
Laxman Singh Bisht
Tue, Sep 1, 2026
खटीमा गोलीकांड की शहादत को उत्तराखंड कभी नहीं भूल सकता—शशांक पांडे

1 सितंबर 1994 उत्तराखंड के इतिहास में वह तारीख है जब पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन ने अपने संघर्ष का एक बेहद पीड़ादायक अध्याय देखा। खटीमा की धरती पर राज्य आंदोलनकारियों पर हुई पुलिस फायरिंग में कई आंदोलनकारियों की जान चली गई। यह घटना उत्तराखंड के जनमानस को झकझोर देने वाली थी। खटीमा गोलीकांड ने आंदोलन की दिशा और तीव्रता को बदल दिया तथा पृथक राज्य की मांग को और अधिक व्यापक जनसमर्थन मिला।आज जब उत्तराखंड राज्य अपने गठन के वर्षों बाद विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है, तब उन दिनों को याद करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह राज्य केवल प्रशासनिक सीमाओं के पुनर्गठन से अस्तित्व में नहीं आया था। इसके पीछे दशकों की पीड़ा, पहाड़ के लोगों की आकांक्षाएं, रोजगार और पलायन की समस्याएं, सामाजिक संघर्ष और हजारों आंदोलनकारियों का त्याग जुड़ा हुआ है। इस संघर्ष की सबसे दर्दनाक स्मृतियों में खटीमा गोलीकांड का नाम सबसे ऊपर आता है।उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की अपनी भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां रही हैं।

पहाड़ों में जीवन हमेशा से कठिन रहा है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित रोजगार के अवसरों, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और लगातार बढ़ते पलायन ने यहां के लोगों के भीतर लंबे समय से असंतोष पैदा किया था।लोगों को महसूस होता था कि लखनऊ स्थित तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के लिए पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याएं प्राथमिकता नहीं बन पा रही हैं। पहाड़ के गांवों से बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में मैदानों की ओर जाने लगे थे। सेना में सेवा करने की मजबूत परंपरा होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सीमित थे। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई और संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव भी लोगों की परेशानी बढ़ा रहा था।धीरे-धीरे यह भावना मजबूत होने लगी कि पहाड़ी क्षेत्रों की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप प्रशासन और विकास की व्यवस्था के लिए अलग राज्य आवश्यक है। पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग ने इसी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से जन्म लिया।वर्ष 1994 आते-आते पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग एक व्यापक जनआंदोलन का रूप ले चुकी थी। इस आंदोलन की विशेषता यह थी कि इसमें समाज के लगभग हर वर्ग की भागीदारी दिखाई देने लगी। विद्यार्थी, कर्मचारी, महिलाएं, पूर्व सैनिक, व्यापारी, किसान, युवा और आम ग्रामीण सभी अपने-अपने स्तर पर आंदोलन से जुड़ रहे थे।यह आंदोलन केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहा। मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले उत्तराखंड मूल के लोगों ने भी इसमें अपनी भागीदारी दर्ज कराई। गांव-गांव में बैठकों का आयोजन होने लगा और लोग जुलूस, धरने तथा प्रदर्शन के माध्यम से अपनी मांग सरकार तक पहुंचाने लगे।इसी क्रम में 1 सितंबर 1994 को खटीमा में आंदोलनकारियों का एक बड़ा जमावड़ा हुआ। लोग पृथक राज्य की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। वातावरण में उत्साह के साथ-साथ अपनी मांग को लेकर दृढ़ता थी। आंदोलनकारियों का उद्देश्य अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाना था।लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि यह दिन उत्तराखंड के इतिहास में रक्तरंजित स्मृति बनकर दर्ज होने वाला है।1 सितंबर का दिन आगे बढ़ने के साथ ही परिस्थितियां तनावपूर्ण होती गईं। आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति बनी और देखते ही देखते स्थिति गंभीर हो गई।

इसके बाद पुलिस की ओर से गोलीबारी की गई।इस गोलीकांड में कई आंदोलनकारी घायल हुए और 7 आंदोलनकारियों ने अपने प्राण गंवाए। खटीमा की धरती पर बहा आंदोलनकारियों का रक्त पूरे उत्तराखंड के लिए एक गहरा आघात था।जिन लोगों ने अपने अधिकार और अपने क्षेत्र के भविष्य के लिए आवाज उठाई थी, उनमें से कई लोग अपने घर वापस नहीं लौट सके। किसी मां का बेटा, किसी बहन का भाई, किसी पत्नी का पति और किसी बच्चे का पिता हमेशा के लिए उनसे दूर हो गया।उन परिवारों के लिए आंदोलन अब केवल एक राजनीतिक संघर्ष नहीं रहा था, बल्कि उनके अपने जीवन का हिस्सा बन चुका था।खटीमा गोलीकांड की खबर जैसे-जैसे उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में पहुंची, लोगों में गहरा आक्रोश फैल गया। इस घटना ने आंदोलन को कमजोर करने के बजाय उसे और अधिक व्यापक बना दिया।खटीमा की घटना के अगले ही दिन 2 सितंबर 1994 को मसूरी में भी गोलीकांड हुआ। इसके बाद उत्तराखंड आंदोलन ने और उग्र रूप ले लिया। जगह-जगह प्रदर्शन हुए, बंद आयोजित किए गए और बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए।खटीमा और मसूरी की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब पृथक राज्य की मांग को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। आंदोलन ने पूरे समाज को एक सूत्र में बांध दिया।उत्तराखंड आंदोलन की चर्चा महिलाओं की भागीदारी के बिना अधूरी है। पहाड़ की महिलाओं ने आंदोलन में जिस साहस और सक्रियता का परिचय दिया, वह अपने आप में इतिहास है।जो महिलाएं रोज पहाड़ की कठिन जिंदगी में पानी, लकड़ी और चारे की व्यवस्था करती थीं, उन्होंने राज्य आंदोलन में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने जुलूसों और प्रदर्शनों में हिस्सा लिया तथा अपने परिवारों को आंदोलन से जोड़ने का काम किया।खटीमा गोलीकांड और उसके बाद हुई घटनाओं ने पृथक राज्य आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया। वर्षों तक चले संघर्ष, आंदोलनकारियों के त्याग और अनेक कठिन परिस्थितियों के बाद अंततः 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।इसके पीछे उन लोगों के सपने थे जो चाहते थे कि पहाड़ की समस्याओं को पहाड़ की परिस्थितियों को समझने वाली सरकार प्राथमिकता दे।इसलिए उत्तराखंड के निर्माण का इतिहास लिखते समय खटीमा के शहीदों को भुलाया नहीं जा सकता।आज उत्तराखंड को बने कई वर्ष हो चुके हैं। राज्य ने शिक्षा, सड़क, पर्यटन, स्वास्थ्य, संचार और आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। उत्तराखंड ने देश को प्रशासन, सेना, शिक्षा, खेल, कला और अन्य क्षेत्रों में अनेक प्रतिभाएं दी हैं।लेकिन दूसरी ओर कुछ सवाल आज भी हमारे सामने खड़े हैं।पहाड़ से पलायन अब भी एक गंभीर चुनौती है। कई गांवों में आबादी लगातार कम हो रही है। युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराना आज भी बड़ी आवश्यकता है। दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा की बेहतर सुविधाएं पहुंचाना भी चुनौती है।ऐसे में खटीमा गोलीकांड की बरसी केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है। यह वर्तमान से सवाल पूछने का दिन भी है।हर वर्ष 1 सितंबर को खटीमा गोलीकांड के शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है। कार्यक्रम आयोजित होते हैं, पुष्पांजलि अर्पित की जाती है और शहीदों को याद किया जाता है। यह आवश्यक भी है।लेकिन शहादत की स्मृति केवल माल्यार्पण और भाषणों तक सीमित नहीं रहनी चाहिएशहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी, जब उत्तराखंड के गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, जब पहाड़ के बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए मजबूरन दूर नहीं जाना पड़ेगा, जब दूरस्थ क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होंगी और जब पलायन के कारण खाली होते गांवों में फिर से जीवन लौटेगा।राज्य आंदोलन का मूल उद्देश्य केवल एक नया राज्य बनाना नहीं था। उसके पीछे एक ऐसी व्यवस्था की कल्पना थी जिसमें पहाड़ के लोगों की समस्याओं को समझा जाए और उनके विकास को प्राथमिकता दी जाए।खटीमा गोलीकांड हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज कितनी महत्वपूर्ण होती है। किसी भी आंदोलन के पीछे केवल नारे नहीं होते, बल्कि लोगों की उम्मीदें और भविष्य से जुड़े सपने होते हैं।खटीमा के शहीदों ने अपने जीवन का बलिदान दिया। उनके परिवारों ने अपनों को खोया। हजारों आंदोलनकारियों ने संघर्ष किया। तब जाकर उत्तराखंड राज्य का सपना साकार हुआ।आज हमारी जिम्मेदारी है कि हम उस इतिहास को केवल किताबों में दर्ज घटना न समझें, बल्कि उससे सीख लें।1 सितंबर 1994 की खटीमा की घटना उत्तराखंड की सामूहिक स्मृति का हिस्सा है। खटीमा की धरती पर शहीद हुए आंदोलनकारियों की स्मृति आने वाली पीढ़ियों को यह बताती रहेगी कि उत्तराखंड किसी उपहार के रूप में नहीं मिला, बल्कि इसके निर्माण के पीछे संघर्ष और बलिदान की लंबी कहानी है।आज जब हम खटीमा गोलीकांड के शहीदों को नमन करते हैं, तो हमें यह संकल्प भी लेना चाहिए कि जिस उत्तराखंड के लिए उन्होंने अपना जीवन दिया, उसे बेहतर, आत्मनिर्भर, समृद्ध और पलायन-मुक्त बनाने के प्रयासों में हम अपनी भूमिका निभाएंगे।
(लेखक लोहाघाट जिला चम्पावत निवासी हैं)
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